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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 35.pdf/३५०

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२१०. भाषण : बौद्ध युवक संघ, कोलम्बोमें २५ नवम्बर, १९२७ प्रारम्भमें गांधीजीने सहिष्णुता की आवश्यकता समझाई। उन्होंने कहा कि में किसी भी तरहसे विद्वान होनेका दावा नहीं करता। धर्मके सम्बन्धमें मैंने अपना अध्ययन एडविन आर्नोल्डकी कृति 'लाइट ऑफ एशिया' से शुरू किया। इस पुस्तकने मुझे मुग्ध कर लिया। तभीसे बुद्ध मेरे मनपर छाये रहे हैं, इतने कि मुझे प्रच्छन्न तक कहा गया है। और जैसा कि एक बार मैंने पहले भी कहा है, इस आरोपको मैं अपनी प्रशंसा मानता हूँ, हालांकि में जानता हूँ कि यदि मैं खुद ऐसा कोई दावा करूँ तो कट्टर बौद्ध लोग उसे तुरन्त अस्वीकार कर देंगे। फिर भी, एक ऐसे व्यक्ति के नाते, जिसने बौद्ध धर्मको भावनाको ग्रहण किया है, में सम्पूर्ण विनयके साथ किन्तु निःसंकोच भावसे फिर वही बात कहूँगा -- हालांकि दूसरे शब्दोंमें -- जो मैंने पिछले प्रसंगपर कही थी। उन्होंने कहा : हिन्दू धर्म में विभिन्न धर्मोके ठीक-ठीक और श्रद्धापूर्ण अध्ययनके लिए कुछ शर्तें रखी गई हैं। वे शर्तें ऐसी हैं जो सर्वत्र लागू होती हैं। यह भी याद रखिए कि गौतम एक सच्चे हिन्दू थे । वे हिन्दूधर्मकी भावनासे ओतप्रोत थे, वैदिक भावनासे आपूरित थे । उनका जन्म और लालन-पालन उसी प्रेरणाप्रद परिवेश में -- मनुष्यकी आत्माके लिए प्रेरणाप्रद परिवेशमें -- हुआ था; और जहाँतक मैं जानता हूँ उन्होंने हिन्दू-धर्म या वेदोंके सन्देशको कभी अस्वीकार नहीं किया । उन्होंने जो कुछ किया वह यह कि जिस निर्जीव धार्मिक वातावरणमें उनकी आत्मा आकुल हो रही थी, उसमें एक जीवन्त सुधार किया। मैं यह कहनेका साहस करता हूँ कि उस महात्माने जिस स्रोतसे प्रेरणा ग्रहण की उस मूल स्रोतका अध्ययन किये बिना आपका बौद्ध धर्मका अध्ययन अधूरा रहेगा; अर्थात्, जबतक आप संस्कृत और संस्कृत धर्मग्रन्थोंका अध्ययन नहीं करते तबतक आपका अध्ययन अधूरा रहेगा। लेकिन यदि आप बौद्ध धर्मके शाब्दिक वर्णनको नहीं, बल्कि उसकी भावनाको समझना चाहते हैं तो आपका कर्त्तव्य यहीं समाप्त नहीं होता । उस अध्ययनके साथ वे शर्तें जुड़ी हुई हैं, जिनके बारेमें अब मैं बताऊँगा । वे शर्तें ये हैं कि जो पुरुष अथवा स्त्री धर्मका अध्ययन करना चाहे, उसे सबसे पहले तो पांचों यमोंका पालन करना चाहिए। ये पाँच यम आत्म-संयमके नियम हैं । वे इस प्रकार हैं: एक तो है ब्रह्मचर्य; दूसरा सत्य; तीसरा अहिंसा अर्थात् तुच्छसे-तुच्छ प्राणीके विरुद्ध भी हिंसा न करना; और चौथा अस्तेय । अस्तेयका मतलब चोरी न करना है। लेकिन यहाँ चोरीका वह अर्थ नहीं है जो हम सामान्यतया लगाते हैं । उसमें जो वस्तु आपकी नहीं है, उसे किसी भी तरहसे ग्रहण करना या उसे सतृष्ण दृष्टिसे देखना तक शामिल है । पाँचवाँ नियम है अपरिग्रह । जो मनुष्य सांसारिक सम्पदाओंका स्वामी Gandhi Heritage Portal