२३७. खादीका अर्थशास्त्र मेरे सामने इस समय खादीसे सम्बन्धित दो छोटी-छोटी किताबें पड़ी हैं। एक है बिहारके श्रीयुत राजेन्द्रप्रसादकी लिखी 'खादीका अर्थशास्त्र', जो बिहार चरखा- संघ कार्यालय, मुजफ्फरपुर से तीन आनेमें मिलती है । चरखा संघकी बिहार शाखा एक ग्रन्थमाला निकालना चाहती है, और उस मालाकी यह पहली किताब है । दूसरी किताब है गांधी आश्रम, तिरुचेङ्गोडकी रिपोर्ट । यह आश्रम श्रीयुत चक्रवर्ती राज- गोपालाचारीके निर्देशन में चलता है। यह रिपोर्ट, मन्त्री, गांधी आश्रम, तिरुचेङ्गोड ( दक्षिण भारत ) को एक आनेका डाक टिकट भेजनेसे मिल सकती है। पहली किताबकी शैली बहुत सुगम है और संक्षेपमें लिखी गई है जिससे कि कामकाजी साधारण आदमी भी उसे पढ़कर खादीका अर्थशास्त्र समझ सके । मैं यहाँ उसकी दलीलोंको संक्षेपमें नहीं दूंगा, क्योंकि वह खुद ही चरखेके पक्ष में दी जा सकने- वाली दलीलोंका संक्षेप मात्र है। मगर यह कहा जा सकता है कि पक्ष-विपक्षकी सभी दलीलोंको सामने रखने के बाद राजेन्द्रबाबूने यह दिखलाया है कि केवल चरखेके जरिये ही विदेशी कपड़ेको देशसे हटाने में सफलता मिल सकती है और बाईस करोड़ चालीस लाख किसानोंको चरखेके सिवाय दूसरा कोई सहायक धन्धा नहीं दिया जा सकता, जिसके बिना वे आधे पेट रहते हैं और रहेंगे, क्योंकि उन्हें सालमें कमसे कम १२० दिन तो निठल्ले बिताने ही पड़ते हैं, और पड़ेंगे। श्रीयुत राजगोपालाचारीकी रिपोर्ट तो सच्ची बातों और आँकड़ोंका वैज्ञानिक विवेचन है, और वह राजेन्द्रबाबूकी दलीलोंको पूरी तरह सिद्ध करता है और उनको पुष्ट बनाता है । पाठकके लिए यह जानकारी रोचक होगी कि आश्रमके खर्चका ८५ फीसदी तो कतैयों - बुनकरोंके पास जाता है, ९ फीसदी कार्यकर्त्ताओंको मिलता है और ५ फीसदी दूसरे खर्चोंमें जाता है। रिपोर्टमें ऐसे रोचक और शिक्षाप्रद आँकड़े हैं जिनसे मालूम होता है कि कतैयों, बुनकरों और धोबियोंकी कितनी आमदनी हुई है । इन लोगोंको आज जितनी आमदनी हो रही है, वह चरखेके बिना इनमें से शायद किसीको भी नहीं होती और कतैयोंको तो निश्चय ही कोई आमदनी नहीं होती । इस रिपोर्टमें आश्रमके कामोंपर हुए आय-व्ययका भी प्रमाणित लेखा दिया हुआ है । एक पृष्ठमें यह दिखलाया गया है कि ग्राहक खादीका जो मूल्य देता है उसका वितरण किस प्रकार होता है । आँकड़े ये हैं : किसान कातने और बुननेवाले कार्यकर्त्ता अन्य खर्च ३७ फीसदी ५४ फीसदी ६ फीसदी ३ फीसदी Gandhi Heritage Porta
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 35.pdf/३९८
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