१३७. पत्र : रैहाना तैयबजीको १९ मार्च, १९२८ प्रिय रहाना, निःसन्देह तुम जब आना चाहो आ सकती हो और जितने दिन यहाँ रहना चाहो रह सकती हो । सस्नेह, अंग्रेजी (एस० एन० ९६०७ ) की फोटो नकलसे । १३८. पत्र : च० राजगोपालाचारीको बापू प्रिय च० रा०, आश्रम साबरमती १९ मार्च, १९२८ आपका पत्र मिला । आपने चूंकि बादामों और बेचारी मूंगफलियोंको हिमालयकी पहाड़ी जातियोंका आहार बताते हुए व्यर्थका विरोध प्रकट करते हुए लम्बी चौड़ी हाँकी है, इसलिए पथ्य-विज्ञानके सम्बन्ध में आपकी कोई सुनवाई नहीं हो सकती । ध्यान रखियेगा कि यह प्रयोग मात्र इसलिए स्थगित किया गया है कि मैं तथाकथित डाक्टरी रायके दबावमें न आकर फिरसे इसे चालू कर सकूं । मैंने कमसे कम छः साल तक कच्ची मूंगफलियों पर निर्वाह किया है। मुझे तो ऐसा कोई कष्ट कभी नहीं हुआ जैसा आपने बताया है। खैर, इसके बारेमें फिर लिखूंगा । । यूरोप यात्राके सम्बन्धमें आपकी क्या राय है ? मैं रोलाँसे मिलनेके लिए उत्सुक हूँ। वह मुझे यूरोपके सबसे अधिक बुद्धिमान् व्यक्ति लगते हैं । वह मुझमें बहुत ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं । यदि उन्हें ऐसा लगे कि किसी एक चीजमें भी मेरी राय गलत है, तो इससे उन्हें बड़ा कष्ट होता है। मुझे ऐसा लगता है कि यदि हम न मिल सके तो यह बड़े दुःखकी बात होगी । यहीं एक कारण हैं जो मुझे दूसरी सारी चीजोंसे अधिक विचलित किये हुए है । शेष सब गौण हैं । मुझे नहीं मालूम कि एन्ड्रयूजने आपको क्या लिखा है । परन्तु आपकी रायका मेरे लिये उतना ही महत्व होगा जितना एन्ड्रयूजकी रायका । इसलिए आप निडर होकर कहिये कि आप मुझसे क्या करनेकी आशा करते हैं । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१५९
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