सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१६२

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

प्रिय सुरेश बाबू, १४१. पत्र : सुरेशचन्द्र बनर्जीको सत्याग्रह आश्रम साबरमती २० मार्च, १९२८ जितने कतैयोंकी आप सेवा करते हैं, उसके सम्बन्धमें मन्त्रीका पत्र मैंने देखा है । क्या आप कतैयोंके पास स्वयं जाना उतना ही आवश्यक नहीं समझते जितना कि आप अपनी किताबोंको पूरी तरहसे व्यवस्थित रूपमें रखना आवश्यक समझते हैं? यदि आप यह सावधानी नहीं बरतते तो एक दिन आपकी यह संस्था ताशके पत्तोंके घरकी तरह ढह जायेगी । सप्ताह के किसी विशेष दिन किसका सूत आपको मिला, यह महत्वकी बात नहीं है; यह बात अवश्य महत्वकी हैं कि आप उन लोगोंके पास, जो वास्तवमें कातते हैं, किसी विश्वसनीय व्यक्तिको भेजें, जो उनसे बात करके उनकी कठिनाइयोंका पता लगाए । और निश्चय ही यह न तो असम्भव कार्य है और न कोई बहुत बड़ा काम । आपका काम तो इतना ही है कि जब कतैये अपना सूत दलालको बेचकर वापस जा रहे हों, आप उनके पीछे-पीछे उनके घर तक चले जायें। हो सकता है कि वे आपसे एक बार कतरा जायें, पर वे हमेशा आपसे नहीं कतरायेंगे । ज्यों ही आप परसे उनका अविश्वास दूर हो जायेगा, वे आप पर भरोसा करने लगेंगे। आपके पास कमसे-कम कुछ ऐसे ईमानदार दलाल अवश्य होने चाहिए जो आपके सन्देशवाहकको ऐसे हर घरमें जहाँसे वे सूत खरीदते हैं, ले जानेपर कोई एतराज न करें। और यदि यह इतनी आसान बात आपकी सामर्थ्यसे बाहर है, तो जाहिर है कि आप पूरी तरहसे दलालों- की दयापर निर्भर हैं; वे तो चाहें जब अपना यह काम बन्द कर सकते हैं अथवा ऐसी शर्तें लगा सकते हैं, जिनको मानना या तो असम्भव होगा या वे आपके स्वाभिमानको ठेस पहुँचानेवाली होंगी। इसलिए मैं चाहता हूँ कि मेरे कहनेपर समय-समय पर श्री बैंकर जो सलाह देते रहे हैं, आप उसका महत्व महसूस करें । अंग्रेजी (एस० एन० १३११३) की फोटो नकलसे । हृदयसे आपका, Gandhi Heritage Portal