प्रिय जवाहर, १४२ पत्र : जवाहरलाल नेहरूको 8941 सत्याग्रह आश्रम साबरमती २० मार्च, १९२८ मुझे तुम्हारे दो पत्र मिले हैं। मैं यह पत्र तुम्हारे द्वारा उल्लिखित मित्रको सन्देश' भेजनेका वायदा पूरा करनेके लिए लिख रहा हूँ । उन्होंने अब सीधा मुझे पत्र लिखा है पर चूँकि सन्देश भेजनेका वायदा मैंने तुमसे किया था, मैं पत्रके साथ सन्देश तुम्हें ही भेज रहा हूँ; आशा है कि बहिष्कार और मिलों सम्बन्धी मेरे लेख तुम ध्यानसे पढ़ रहे होगे । मैं मिल-मालिकोंसे भी सलाह मश्विरा कर रहा हूँ । वे किसी फैसलेपर पहुँचेंगे भी या नहीं, मैं नहीं जानता । पर यदि तुम्हें कहीं भी गलती या कमजोरी नजर आये तो मुझे अवश्य बताना । कमला कैसी चल रही है ? गर्मियोंमें तुम उसे कहाँ रखनेका इरादा कर रहे हो ? अंग्रेजी (एस० एन० १३११६) की फोटो नकलसे । १४३. सन्देश हृदयसे तुम्हारा सत्याग्रह आश्रम साबरमती २० मार्च, १९२८ जबतक मुख्य कारण अर्थात् सशक्तों द्वारा अशक्तोंके शोषणको समाप्त नहीं किया जाता, तबतक विभिन्न जातियों और राष्ट्रोंमें परस्पर जीवन्त सामंजस्य नहीं स्थापित हो सकता । 'योग्यतम ही टिकता है' इस तथा कथित सिद्धान्तकी व्याख्यामें संशोधन अवश्य किया जाना चाहिए । अंग्रेजी (एस० एन० १३११७) की फोटो नकलसे । १. देखिए अगला शीर्षक । २. पिछले शीर्षकका सह-पत्र। (ह०) मो० क० गांधी Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१६३
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