१४९. भेंट : एलिस शैलेकसे २० मार्च, १९२८ महात्मा गांधीने २० मार्च को आश्रममें चार बजे कुमारी एलिस शैलेकसे भेंट की। जब वे अन्दर आई उन्होंने कहा : बैठे रहनेके लिए आप कृपया मुझे क्षमा करेंगी, मैं खड़ा नहीं हो सकता । कु० शैलेक : क्या मैं कुछ प्रश्न पूछ सकती हूँ ? गांधीजी : अवश्य, कृपया पूछिए । आपका प्रभाव बढ़ रहा है या घट रहा है ? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर देना बड़ा कठिन है, लेकिन जहाँतक जनताका सम्बन्ध है, मैं समझता हूँ कि प्रभाव बढ़ रहा है । क्या यह सच है कि आपके विचारसे अंग्रेजोंने भारतका कुछ भी भला नहीं किया है ? यहाँतक कि आप रेलोंको भी हानिकारक मानते हैं ? कुछ हद तक यह सही है । कुल मिलाकर ब्रिटिश राज्यका भारत पर केवल बुरा प्रभाव ही पड़ा है। रेलोंने भलाईके बजाय हानि अधिक पहुँचाई है । क्या वे अकालके मौकोंपर लाभदायक सिद्ध नहीं हुई हैं ? वे अस्थाई तौरपर लाभदायक हो सकती हैं । परन्तु सामान्यतः उन्होंने ग्रामीणोंसे उन चीजोंको छीननेका ही काम किया है, जिनकी उन्हें खुद अपने लिये जरूरत रहती है । लेकिन उसके बदले में उन्हें पैसा मिलता है । परन्तु पैसा तो वे खा नहीं सकते। यदि आप सहाराके रेगिस्तानमें हों और आपके पास अपनेको जीवित रखने भरके लिए ही पानी हो, तो क्या आप किसी भी कीमत पर उसे बेचेंगी ? परन्तु क्या वे पैदावारका सिर्फ वही भाग नहीं बेचते जो फाजिल है ? अपनी पैदावारको कच्चे मालके रूपमें बेचना अपना जन्मसिद्ध अधिकार बेचना है । वे ऐसा इसलिए करते हैं कि उन्हें उसके प्रयोगका दूसरा कोई बेहतर उपाय मालूम नहीं। यदि आप मनसे मेरी भलाई चाहती हैं तो क्या आप मुझे खाल बेचकर आपसे, बने हुए जूते खरीदने अथवा अपना कपास आपको बेचकर बुना हुआ कपड़ा खरीदनेकी सलाह देंगी ? मैं अपने देशवासियोंसे अपना कपास जमा कर रखने और उसकी रूईसे सूत कातकर अपना कपड़ा खुद तैयार करनेको कहता हूँ । कहते हैं कि जहाँ रेले हैं वहाँ भुखमरी नहीं है। अकालके मौकेपर रेलें उन जगहोंसे जहाँ खाद्यान्न अधिक होता है, उन जगहोंपर, जहाँ उनकी आवश्यकता हो, बहुत तेजी से ले जाती हैं । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१६७
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