भेंट : एलिस शैलेकसे १३७ क्या आप यह सोचते हैं कि आप अहिंसा और सत्यके द्वारा अपने देशको स्वतंत्र करा सकेंगे ? मेरा अपना विश्वास तो यही है कि हम स्वतन्त्रता केवल अहिंसाके द्वारा ही प्राप्त कर सकते हैं, किसी और तरीकेसे नहीं। मैं हिसाके बजाय अहिंसाके द्वारा इसकी प्राप्ति अधिक सम्भाव्य मानता हूँ । स्वतन्त्रतासे आपका क्या अभिप्राय है ? मैं गलती करने और उसको सुधारनेकी तथा पूरी ऊँचाई तक ऊपर उठने और गिरनेकी स्वतन्त्रता चाहता हूँ। मैं बैसाखीके सहारे नहीं चलना चाहता । क्या आप यह नहीं समझते कि अंग्रेजोंने भारतका बहुत उपकार किया है ? सभी आवश्यक मामलोंमें उन्होंने जबर्दस्त हानि पहुँचाई है । 'उन्होंने ' से मेरा मतलब है ब्रिटिश सरकारने । पर आप ऐसा क्यों मानते हैं ? क्यों कि वे जनताकी आर्थिक, बौद्धिक और नैतिक उन्नतिका धीरे-धीरे ह्रास करते चले गये । क्या आप यह नहीं मानते कि उन्होंने भारतकी आर्थिक उन्नतिमें मदद की है ? स्वयं सरकारी अधिकारियोंकी अपनी रिपोर्टके अनुसार भारत अब ५० साल पहलेसे ज्यादा गरीब है । कुछ व्यक्ति भले ही सम्पन्न हो गये हों, लेकिन सामान्यतः गरीबी बढ़ ही रही है। सम्पत्तिका कुछ स्थानान्तरण हुआ है; लेकिन सामान्य तौरपर देशकी समृद्धि नहीं हुई है । सरकारका कहना है कि चीजें पहले कभी इतनी नहीं खरीदी जाती थीं । यदि वे यह समझते हैं कि लोग पहले चीजें खरीद नहीं सकते थे जबकि अब खरीद सकते हैं, तो उनका ऐसा समझना गलत है। ऐसा समझना इस अर्थ में तो सही है कि लोग उन दिनों ज्यादा वस्तुएँ नहीं खरीदते थे, अब वे खरीदते हैं और अब खरीदनेके लिए [ बाजारमें ] ज्यादा वस्तुएँ हैं । ब्रिटिश मालका बहिष्कार करनेमें क्या तुक है ? इंग्लैंड अपने मालको ही तो तरजीह नहीं देता । यहाँ संसारके सब राष्ट्रोंको प्रतियोगिताकी पूरी छूट है । । नहीं यह गलत है । खुली प्रतियोगिता तो केवल एक दिखावा है । इंग्लैंड कितने ही प्रकारके छल-प्रपंचों द्वारा अपने मालको तरजीह जरूर देता है। दिखावटी तौर पर [ हर राष्ट्रको अपना माल बेचनेकी ] स्वतन्त्रता है पर सच्ची स्वतन्त्रता नहीं है । और यदि ब्रिटिश, विदेशियोंका पक्ष लेनेमें निष्पक्ष हों तो भी मेरा उनसे झगड़ा ही रहेगा । मैं चाहता हूँ कि भारतीय हितोंको तरजीह दी जाये । कैसे ? सभी प्रकारके विदेशी कपड़ेका आयात बन्द करके, और उन सभी आयात की हुई वस्तुओंपर, जिनका उत्पादन यहाँ किया जा सकता है, भारी कर लगाकर । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१६९
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