१३८ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय परन्तु आपका उत्पादन व्यय बहुत अधिक होगा । कीमतोंका नीचा या ऊँचा होना किसी देशके उत्कर्ष या अपकर्षका परिचायक नहीं होता । कीमतके कुछ अधिक होनेपर भी किसी दूसरे पर निर्भर रहनेके बजाय यदि मैं अपनी सब्जी आप उगाता हूँ तो वह निश्चय ही कहीं ज्यादा अच्छा है। बादमें मैं किफायत और सुव्यवस्थाका सहारा लेकर कीमतको कम करनेका प्रयत्न करूँगा । सब्जी उगानेमें कुशलता प्राप्त करने, उससे मिलनेवाले सुख, और इस बोधसे कि अपनी सब्जी हम स्वयं उगाते हैं, जो लाभ होता है, वह उस थोड़ेसे लाभसे कहीं अधिक है जो हमें अहमदाबादसे सस्ती सब्जी खरीदने पर मिल सकता है। कपड़ा उत्पादनके सम्बन्ध में भी हम यह सब थोड़े ही समयमें कर सकते हैं बशर्ते कि हमें अपने ही साधनोंको इस्तेमाल करने दिया जाये । संसारमें कोई भी देश विदेशी प्रतियोगितासे बरी नहीं है । क्षमा करें। जर्मनीमें परिस्थिति दूसरी है । जर्मनीने जबर्दस्त कर लगाकर विदेशी चीनीको अपने यहाँ आनेसे रोका और फिर बड़ी सफलताके साथ चुकन्दरसे चीनी बनाई । प्रत्येक राष्ट्र अपने नव-उद्योगकी रक्षा अनुदान देकर और तटकर लगाकर करता है । आपके कहने का मतलब है कि सभी विदेशी आयात बन्द कर दिया जाये और भारतमें केवल देशमें बना माल ही प्रयोगमें लाया जाये ? हम वह सब सामान विदेशोंसे मँगा सकते हैं जिन्हें हम नहीं बना सकते जैसे कि हम आयोडीन ब्रिटेन या जर्मनीसे, मोती अरबसे, हीरे जोहानिसबर्गसे, लीवरकी घड़ियाँ इंग्लैंडसे तथा पढ़ने योग्य अच्छी पुस्तकें इंग्लैंड, अमेरिका तथा संसारके सब देशोंसे मँगा सकते हैं। बेशक सुइयाँ और पिनें दोनों ही खतरनाक चीजें -- मैं विदेशोंसे मँगाना चाहूँगा । इसके अतिरिक्त अन्य बहुत-सी वस्तुएँ मैं गिना सकता हूँ जिनको दूसरे देशोंसे मँगाना चाहिए। और हम उन चीजोंको, जिनकी उन्हें आवश्यकता है, मुनाफे पर निर्यात करें, पर हमें किसी पर कोई चीज लादनी नहीं चाहिए। उदाहरणार्थ मैं अफीमका उत्पादन भले ही करूँ, पर उसे अमेरिका और चीन पर लादनेका विचार मुझे नहीं करना चाहिए । लेकिन यदि आप अपनी जरूरतकी चीजें आप ही बनायेंगे तो क्या आपको श्रम-सम्बन्धी सवालोंका सामना नहीं करना पड़ेगा ? क्यों ? यदि वे उठेंगे तो स्वयं ही सुलझ भी जायेंगे । आप यह सब पूँजीवादके आधारपर करेंगे या साम्यवादके आधारपर ? लोगोंकी भलाईको दृष्टिमें रखकर राष्ट्रीय आधारपर । पर उद्योगोंमें पूंजी कौन लगायेगा ? हम स्वयं । हमारी पूंजी तो हमारे पुरुष और हमारी महिलाएँ हैं, और वे हमारे यहाँ करोड़ोंकी संख्या में हैं । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१७०
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