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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१७२

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प्रिय मित्र, १५२. पत्र : टी० डि मंजीयरलीको सत्याग्रह आश्रम साबरमती २१ मार्च, १९२८ इतने दिनों बाद आपका पत्र पाकर प्रसन्नता हुई। आपने जिन दो पुस्तकोंका उल्लेख किया है, वे दोनों 'हैंड स्पिनिंग ऐसे', और 'द गाइड टु हेल्थ' तथा एक तीसरी पुस्तक 'तकली टीचर' अपनी ओरसे भेज रहा हूँ । अपने पत्रके दूसरे अनुच्छेदमें आपने जो कुछ कहा है उसके सम्बन्धमें मैं केवल इतना ही कहना चाहूँगा कि जीवनमें सादगीका परम भक्त होनेके साथ-साथ मैंने यह भी जान लिया है कि सादगीकी यह ध्वनि जबतक हृदयसे नहीं निकलती, तबतक वह बेकार है । तथाकथित सभ्य जीवनके इस आधुनिक व्यवस्थित बनावटीपनकी हृदयकी सच्ची सादगी से कोई संगति नहीं बैठ सकती । जहाँ इन दोनोंमें सामंजस्य नहीं होता वहाँ हमेशा या तो घोर आत्मवंचना होती है या पाखण्ड । श्रीमती टी० डि मंजीयरली २१, रुई डु चेमिन वर्ट कोवोई सेन अंग्रेजी (एस० एन० १४२६७) की फोटो नकलसे । १५३. पत्र : जोजेफ ए० ब्रॉनको हृदयसे आपका, सत्याग्रह आश्रम साबरमती २१ मार्च, १९२८ प्रिय बहन, मुझे भेजा है, वह श्रीमती शरमनके मार्फत ७० रु० का जो चैक आपने आपकी और आपके क्लबके सदस्योंकी विचारशीलताका द्योतक है। सहृदयताकी जिस १. टी० डि मंजीयरलीने अपने २७ दिसम्बर, १९२७ के पत्रमें लिखा था, “ आप जानते हो हैं कि मैं किस कदर यह चाहता हूँ कि मनुष्य और अधिक सादा रहनेकी आवश्यकताको समझे ताकि उसके पास अधिक सच्चे कामों में लगानेके लिए और अधिक समय और शक्ति रहे। Gandhi Heritage Portal