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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१७४

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय


कि आपका फैसला आने तक हमें काम चलाना ही चाहिए। अगर हम लोगोंने यह भार नहीं उठाया होता तो यहाँका काम बन्द हो जाता और फिरसे काम शुरू करना ज्यादा मुश्किल होता। इसके अलावा कुछ भावनात्मक कारणों से भी उसे छोड़ देना मुश्किल था। कई सालोंसे यह केन्द्र प्रसिद्ध है और बहुत–से कतैयों और बुनकरोंका इससे गहरा सम्बन्ध है। इसे अचानक छोड़ देनेसे आसपासके सभी स्थानोंमें बहुत बुरा असर पड़ता और इसपर निर्भर बहुत–से गरीब आर्थिक कष्टमें पड़ जाते। हमें यह बताया गया था कि गांधी आश्रमके अपना काम बन्द करनेकी घोषणा करनेपर बहुत ही हृदय–द्रावक दृश्य देखनेमें आये थे। बहुतसी बूढ़ी औरतें जो अपना सुत दूर–दूर के केन्द्रोंमें बेचा करती थीं, उन्हें बन्द पाकर कई मील चलकर इस मुख्य केन्द्रमें आई और यह सुनकर कि उनका सूत नहीं लिया जायेगा, रोने लगीं। बहुत–से बुनकर अपने बाल–बच्चोंके साथ अकबरपुर कार्यालय दौड़े आये और कहने लगे, "वाह, सात साल तक हमने आश्रमके लिए काम किया, और अब आप हमें पेड़पर चढ़ाकर सीढ़ी लिये भागे जा रहे हैं। नहीं, यह नहीं हो सकता। हम सत्याग्रह करेंगे।" अब आप समझ सकते हैं कि ऐसी परिस्थितिमें वहाँका काम अपने सिर ले लेने से इनकार करना हमारे लिए कितना मुश्किल था। मगर, आखिर केवल भावनाके वश होकर ही तो कुछ निर्णय किया नहीं जा सकता था। अकबरपुरमें कुछ खास सुविधाएँ हैं और साथ ही एक बहुत बड़ी असुविधा भी है। बुनाईके लिए यह केन्द्र विख्यात है और इसके पास हो, टाँडामें हिन्दुस्तानकी अच्छीसे–अच्छी बुनाई होती है। दुर्भाग्यवश यह महीन बुनाई जिसे जामदानी कहा जाता है विलायती सूतसे की जाती है। दूसरी ओर अकबरपुर के आसपास बहुत कम सूत काता जाता है और अगर इस केन्द्रको चलाना है तो कहीं न कहीं बाहरसे ही सूत मँगाना पड़ेगा। मेरा खयाल है कि गांधी आश्रमवाले, मुख्यतः अपने प्रदेशकी सीमाके उस ओर से, बिहारसे और मुजफ्फरनगरसे भी सूत मँगाते थे। हमारे लिए संयुक्त प्रान्तके उत्तरी जिलोंसे, जैसे कि मुरादाबाद, बिजनौर वगैरहसे सूत मँगाना सहज होगा। सूत भेजनेका खर्च कुछ अधिक नहीं है।

अगर खादी भी घी या अनाज जैसी प्रचलित हो जाये तो किसी केन्द्रसे हटने का विचार करने की भी कभी जरूरत न पड़े। अगर हमारे पास धन और कार्यकर्त्ता हों तो हमारे प्रतिनिधि सिर्फ १,६०० नहीं, बल्कि ७ लाख गाँवोंमें होंगे। यह कोई अव्यावहारिक महत्वाकांक्षा नहीं है। आखिर, हरएक गाँवमें विदेशी सरकारके कमसे–कम दो प्रतिनिधि तो हैं ही। अगर अंग्रेजोंके आनेके पहले कोई ऐसी बात कहता तो उसकी बात हँसीमें ही उड़ा दी जाती। मगर विचार करने पर मालूम हो जाना चाहिए कि १७वीं शताब्दी में हिन्दुस्तानके पंचायती गाँवोंमें साम्राज्यवादी ब्रिटेनके दो–दो प्रतिनिधियोंके होनेकी सम्भावना जितनी हास्यास्पद होती हर गाँवमें चरखेकी