विदेशी वस्त्र बहिष्कार : कुछ प्रश्न १४५ लेंगी और जो फर्क मिटाने योग्य होंगे, उन्हें मिटा दिया जायेगा । मेरी दृष्टिमें जो योजना है, उसके अनुसार तो अन्तमें मिलोंको कुल मिलाकर हानि होनी ही नहीं चाहिए और न ही ग्राहकोंके मत्थे उन्हें नफा उठाना चाहिए। २. खादी न बनानेका निश्चय तो इनी-गिनी ही मिलें करेंगी मगर उनका क्या होगा जो केवल मोटा सूत ही कातती हैं ? खादीकी जाँचकी आपकी कसौटी क्या है ? यह तो खादी संस्थाओं और मिलोंके बीच सामान्य ईमानदारी और व्यवस्थाका सवाल है । हालमें तो, मुझे कहते खेद होता है कि गाँवोंमें खादीके प्रति बढ़ रहे अनुकूल वातावरणका नाजायज लाभ उठानेके लिए कुछ अच्छी मिलें भी अपने कपड़ों पर खादीकी छाप मारनेमें शर्माती नहीं हैं। अगर कोई व्यावहारिक व्यवस्था बन सकी तो मुझे आशा है कि कमसे कम फिलहाल तो यह स्पष्ट निश्चित हो जायेगा कि कौनसे कपड़े मिलें बनाएंगी और कौनसे खादीवाले केन्द्र । अकसर लड़ाईके जमानेमें कपड़े के उत्पादन पर जैसा अंकुश रहता है, वैसा ही इस समय रखा जायेगा । हिंसाके आधारपर होनेवाली लड़ाईमें जो कुछ जबरन कराया जाता है, वह अहिंसा पर आधारित इस लड़ाईमें हम स्वेच्छासे करेंगे। हममें अगर कुछ अहिंसा हो तो, स्वेच्छापूर्वक यानी महज लोकमतके दबावसे बहिष्कार इत्यादि कर सकनेकी हमारी योग्यता, उसकी बाह्री किन्तु लाजिमी कसौटी होगी । ३. नफेपर किस तरह अंकुश रखा जायेगा ? आप भी तो हमारी तरह बखूबी जानते हैं कि रुईकी कीमतोंमें बहुत ही खिझा डालनेवाले अनियमित ढंगसे घटी-बढ़ी होती रहती है। इसमें यह मान लिया गया हैं कि हम रुईके बाजारका नियन्त्रण नहीं कर सकेंगे। निश्चय ही, अगर देशके बड़ेसे-बड़े मिल मालिक इस राष्ट्रीय कार्यमें एक हो जायें तो वे रुईके बाजारका नियन्त्रण कर सकेंगे । अमेरिका हमारी रुईके बाजार पर हावी है, क्योंकि हम मूर्खतासे बिना विचारे और स्वार्थान्ध होकर अपनी रुई बाहर भेज देते हैं । किन्तु बहिष्कारका तो अर्थ ही यह है कि जैसे हम और बहुत- सी चीजोंका नियन्त्रण करेंगे, वैसे ही रुईके आवागमनका भी। तभी तो बहिष्कारको पूरा सफल बना सकेंगे । और अगर हमने सच्ची राष्ट्रीय भावना पैदा कर ली है और हमें अपने आपमें और राष्ट्रमें विश्वास है, तो वह नियन्त्रण हमें करना ही होगा । ४. अगर आप ईमानदारी, सतत प्रयत्न, पारस्परिक विश्वास आदिपर बहुत जोर देंगे तो आपकी असफलता निश्चित है। चूंकि मेरे पास तलवार नहीं है और मिल भी सके तो मैं उसे नहीं लूंगा, इसलिए, मुझे इन्हीं गुणों पर जोर देना पड़ेगा, जिनकी कीमत के बारेमें इस मित्रको शंका है। मगर मुझे ऐसी कोई शंका नहीं है । वल्कि मुझे तो इतना काफी धैर्य है कि अगर वे गुण आज यथेष्ट मात्रामें मिलते हों तो उनके विकसित होने तक मैं ३६-१० Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१७७
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