१४६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय ठहरनेको भी तैयार हूँ। क्योंकि यह राष्ट्र तबतक स्वतन्त्र नहीं होगा, जबतक कि हमारे सारे राष्ट्रमें ये गुण नहीं आ जाते। मैं यह भी जानता हूँ कि पशुबल, धोखेबाजी इत्यादि सीखनेमें सत्य, अहिंसा और उनमें समाविष्ट अन्य सारे गुणोंका अभ्यास करनेकी अपेक्षा कहीं अधिक समय लगेगा । इसके बाद ये मित्र इस बातपर मेरा ध्यान दिलाते हैं कि मेरे पिछले लेखमें। निम्नलिखित बातें छूट गई हैं: (क) जो मिलें इस योजनामें शामिल हों उन्हें विदेशी सुत या विलायती नकली रेशमका प्रयोग त्यागना होगा जैसा कि आज बहुत-सी मिलें कर रही हैं। (ख) वे विदेशी कम्पनियोंके यहाँ बीमा न करायेंगी । (ग) वे विदेशी कपड़ा मँगाकर उसपर स्वदेशीका छापा नहीं लगायेंगी । मैंने तो मान लिया था कि (क) और (ग) पहलेसे ही निश्चित हैं। अगर (ख) पर जोर देनेसे प्रस्तावित संयुक्त योजनाको पूरा करनेमें कठिनाई हो तो मैं उसपर जोर नहीं दूंगा। मैं चाहूँगा तो कि बीमेका काम करनेके लिए स्वदेशी बीमा कम्पनियाँ हों किन्तु मुझे विश्वास है कि जिस तरह विलायती कपड़ा हमारा रास्ता रोके हुए हैं, उस तरह और कोई चीज नहीं रोकती । अगर यह बहुत बड़ी बाधा दूर हो गई तो छोटी-मोटी बाधाएँ हम चुटकी बजाते दूर कर लेंगे । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, २२-३-१९२८ १५७. मतभेव मैं उपर्युक्त पत्र सहर्ष प्रकाशित कर रहा हूँ । अन्तर्राष्ट्रीय बन्धुत्व संघ (इन्टर- नेशनल फेलोशिप) की बैठकोंमें मैंने स्पष्ट कर दिया था कि मेरा आशय जगतके मुख्य धर्मोसे था। और मैंने कहा था कि इन सभी मुख्य धर्मोंमें कम या ज्यादा सच्चाई है, किन्तु अपूर्ण तो सभी हैं ही। इसलिए इस बात में मेरी श्री आयरलैंडसे सहमति है । किन्तु श्री आयरलैंड के पत्र से मनपर यह असर पड़ता है कि धर्म-परिवर्तनके बारेमें, भले ही उसे किसी नामसे पुकारा जाये उनके और मेरे विचारोंमें तात्विक भेद है । उपमामें त्रुटि तो होती ही है, किन्तु मैं सुगंधकी उपमाको थोड़ा समझाकर बताता हूँ । गुलाब अपनी सुगन्ध अनेक तरहसे नहीं, किन्तु एक ही तरहसे फैलाता है। जिन लोगों में घ्राण-शक्ति ही न हो, उन्हें यह सुगन्ध मिलनेसे रही। इस सुगन्धको आप जीभ, कान या त्वचासे तो नहीं महसूस कर सकते । इसी तरह आध्यात्मिकताकी अनुभूति भी आप आध्यात्मिक अनुभवकी शक्ति द्वारा ही कर सकते १. देखिए "हमारी मिलें क्या कर सकती हैं ?", १५-३-१९२८ । २. कैम्ब्रिज मिशनके श्री डब्ल्यू. एफ० आयरलैंडका पत्र यहाँ नहीं दिया गया है। ३. देखिए "बंधुस्व विषयक चर्चा", १५-१-१९२८ से पूर्वं । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१७८
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