मतभेद १४७ हैं, किसी अन्य शक्तिके द्वारा नहीं। इसीलिए सभी धर्मोने इस शक्तिको जाग्रत करनेकी आवश्यकता स्वीकार की है। यह जागृति एक तरहका पुनर्जन्म है। अतिशय आध्यात्मिक शक्ति सम्पन्न व्यक्ति बिना हिले-डुले और बिना एक भी शब्द कहे, ऐसे लाखों आदमियोंके मी हृदयको प्रभावित कर सकता है, जिन्हें न उसने कभी देखा हो और जिसे न उन्होंने मी कभी देखा हो । यदि उसमें आध्यात्मिक शक्ति नहीं है तो अत्यन्त वाक्पटु प्रचारक भी अपने श्रोताओंके हृदयको स्पर्श नहीं कर सकेगा, इसलिए मेरा खयाल है कि आजकलके बहुत-से मिशनोंका प्रयत्न व्यर्थ ही नहीं, बल्कि बहुत बार तो वह हानिकारक भी होता है। इसके अलावा इन मिशनरी प्रयत्नोंके पीछे एक चीज और भी है, जिसे मानकर चला जाता है और वह यह कि मेरी मान्यता महज मेरे ही लिये नहीं बल्कि सारे संसार के लिए सच्ची है । जबकि सचाई यह है कि परमात्मा अपना परिचय हमें ऐसे लाखों तरीकोंसे देता है, जिन्हें हम समझ नहीं पाते। इसलिए मिशनरियोंके प्रयत्नमें उस सच्ची विनयका अभाव है, जो सहज रूपसे मानवकी सीमाओं और ईश्वरकी असीम शक्तियोंको मानकर चलती है । मेरे मनमें यह भाव कभी नहीं आता कि मैं जंगली कहे जानेवाले लोगोंसे आध्यात्मिकतामें जरूर ही बढ़ा-चढ़ा हूँ। और ऐसा महसूस करना खतरनाक भी होता है । आध्यात्मिकता उन अन्य अनेक चीजों जैसी नहीं है, जिन्हें हम अपनी इन्द्रियोंसे ग्रहण कर सकते हैं, जिनका हम विश्लेषण कर सकते और जिनका अस्तित्व हम सिद्ध कर सकते हैं। अगर मुझमें वह है तो दुनियामें ऐसी कोई शक्ति नहीं, जो उसे मुझसे छीन सके और उसका असर यथासमय जरूर होगा। लेकिन अगर मुझे ऐसा लगे कि चिकित्सा-विज्ञान और अन्य प्राकृतिक विज्ञानोंमें मैं दूसरोंसे बढ़-चढ़कर हूँ और यह ऐसी चीज है जिसका भान होना गलत नहीं कहा जा सकता और मुझे अगर अपने साथी भाइयोंसे प्रेम हो तो मैं स्वभावतः उन्हें अपने ज्ञानका लाभ दे दूंगा । किन्तु आध्यात्मिक बातें तो ईश्वर पर ही छोडूंगा और ऐसा करके ही अपने साथी बन्धुओं तथा अपने बीचका सम्बन्ध पवित्र, सही और मर्यादित रखूंगा । किन्तु इस दलीलको और आगे बढ़ाना बेकार है । श्री आयरलैंडके पत्रपर मेरी पहली प्रतिक्रिया यह थी कि मैं उसे प्रकाशित न करूँ, बल्कि निजी तौरपर उन्हें एक संक्षिप्त उत्तर भेज दूं । लेकिन उनके प्रति मेरे मनके आदर-भावने मुझे उनकी यह इच्छा पूरी करनेके लिए प्रेरित किया और इस बातकी प्रतीति होने के कारण कि यह ऐसा विषय नहीं है, जिसके बारेमें खासकर मेरी ओरसे, कोई निर्णयात्मक तर्क दिया जा सकता हो, और ऊपर मैंने जिस स्थितिका वर्णन किया है उसके कारण उनकी इच्छा पूरी करनेमें मुझे कोई कठिनाई भी नहीं हुई । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया २२-३-१९२८ १ और २. देखिए “ दो संशोधन ", २२-३-१९२८ । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१७९
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