१६८. पत्र : एम० पिगॉटको आश्रम साबरमती, प्रिय मित्र, २७ मार्च, १९२८ आपका पत्र मिला । आपने लिखा है कि ३००० रु० मेरे लिये बहुत छोटी रकम है और उक्त विधवा तथा उसके बच्चेके लिए वह बहुत बड़ी है। आपको यह नहीं मालूम है कि मैं इस विधवासे भी ज्यादा गरीब हूँ क्योंकि मेरे पास कोई ऐसी सम्पत्ति नहीं जिसके लिए मैं किसी अदालतमें जा सकूं और प्रिवी कौंसिल तो और भी नहीं जा सकता। मेरे पास खुदका कोई पैसा नहीं है । मैं तो एक मामूली न्यासी हूँ जिसके पास कतिपय सुनिश्चित न्यासोंके लिए कुछ कोष रहते हैं। मैं अपनेमें निहित विश्वासको भंग करनेका जोखिम उठाये बिना उन कोषोंको निर्धारित कामोंके अलावा अन्य कामोंमें नहीं लगा सकता । आपको इस सम्बन्धमें किसी धनवान व्यक्तिसे कहना-सुनना चाहिए। श्री एम० पिगॉट हैदराबाद (सिन्ध ) अंग्रेजी (एस० एन० १३१३२) की फोटो नकलसे । १६९. पत्र : मोतीलाल नेहरूको हृदयसे आपका, आश्रम, साबरमती, २७ मार्च, १९२८ प्रिय मोतीलालजी, जिस पत्रकी आशा थी, वह चूंकि रजिस्ट्रीसे भेजा गया था इसलिए आज ही मिला है। यह एक लम्बा पत्र है । वह' चाहेंगे कि मैं यूरोप जाऊँ, लेकिन खुद जूनसे पहले अपनी जगहपर उनके रहनेकी सम्भावना नहीं है। मैं एक और पत्रके जवाब में उनके पत्रकी आशा कर रहा हूँ। मुझे जानेकी कोई जल्दी नहीं है । इसलिए मैं उनसे और खबर पानेका इन्तजार करूँगा । जाने क्यों इस प्रस्तावित यात्राके लिए मैं मनसे राजी नहीं हो पा रहा हूँ । मेरा मन तो बहिष्कारमें रखा है। अगर बहिष्कारको १. रोमा रोला । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१८७
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