१६४ भी बुरी सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय दूसरी कार्रवाइयोंकी अपेक्षा रखनी चाहिए। यदि उनमें शक्ति है तो वे अब उसे दिखायें । [ अंग्रेजीसे] यंग इंडिया २९-३-१९२८ १८०. राष्ट्रीय सप्ताह राष्ट्रीय सप्ताह हर साल आनेवाले मौसमोंकी तरह नियमित रूपसे आता रहता है, मगर १९२२ के बादसे बराबर ही हममें कुछ न कुछ कमी बनी रही है । ६ से १३ अप्रैल तकके दिन सौभाग्यके, आत्म-निरीक्षणके, खूब जोरोंसे राष्ट्रीय काम करनेके और आत्म-शुद्धिके समझे जाने चाहिए। इन बहुमूल्य सात दिनोंमें अपने किये कामोंका लेखा- जोखा करना चाहिए और अपने दिलको टटोलना चाहिए। ६ अप्रैल, १९१९ की सुबह हिन्दुस्तानके लोगोंमें अपनी प्रतिष्ठाकी भावना जागी थी। हिन्दू, मुसलमान और राष्ट्रके दूसरे लोग एक दूसरेको सगे भाईकी तरह मानने लग गये थे; अगर वे अपने को इसी देशकी सन्तान मानें, तो सगे भाई तो हैं ही। ६ अप्रैल, १९१९ को हिन्दुस्तानमें स्वदेशीकी सच्ची भावना जागी जिसके फलस्वरूप खादी आन्दोलन चला, जो हमारी अन्तिम गणनाके अनुसार आज ९०,००० से मी अधिक गरीब कतैयोंका पेट भर रहा है । इस तरह जो भावना जागी, वह १९२० और २१ में बढ़ती ही गई और हमें लगने लगा कि कानूनी स्वराज्य भी अब नजदीक ही है । मगर वह स्वराज्य नहीं आया और गतिरोध हो गया। तबसे तो देखनेमें ऐसा लगता है कि मानो हम पीछे ही लौटते जा रहे हैं। हिन्दू और मुसलमान एक दूसरेका गला काटनेको टूटे पड़ रहे हैं । आज यह पुकार मची हुई है कि जबतक सरकारसे कुछ फैसला न हो जाये तब- तक स्वदेशी अपनानेके बदले ब्रिटिश मालका बहिष्कार किया जाये; मानो इसमें जापानके सस्ते मालका जिसमें वहाँका सस्ता कपड़ा भी शामिल है, जो समर्थन है वह स्वदेशी अर्थात् शुद्ध खादीका जिसमें सभी विदेशी कपड़ोंके बहिष्कारकी बात है, स्थान ले सकता है । सन् १९२०-२१ में जान पड़ता था कि बहुत खोज, सोच विचार और अनुभवके बाद हम इसी नतीजे पर आ गये हैं कि एकमात्र व्यावहारिक, बा-असर और आवश्यक स्वदेशी वस्तु तो खादी ही है; और वह भी सरकारके साथ किसी फैसले पर न पहुँचने तकके लिए नहीं, बल्कि हमेशाके लिए या कमसे कम तबतकके लिए है जबतक कि हम भूखों मरनेवाले करोड़ों आदमियोंके लिए इससे कोई अच्छा और अधिक आमदनीका धंधा ढूंढ नहीं लेते। कोई ऐसी नई स्थिति पैदा नहीं हो गई है जिसके कारण हम यह मानने लगें कि ब्रिटिश मालका बहिष्कार एक व्यावहारिक प्रस्ताव है और ब्रिटिश मालकी जगह दूसरे विदेशी कपड़ोंका उपयोग करते रहनेसे भी भारतवर्षके स्वार्थको शायद कोई बड़ी हानि नहीं होगी। Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१९६
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