टिप्पणियाँ १६७ तारीखसे बंगालमें दौरा करनेवाले हैं । हालमें बंगालमें स्वदेशीकी एक लहर चल रही है । मगर मुझे लगता है कि शायद इस सीधे-सादे जीवनदायी स्वदेशी शब्दके चारों ओरके शब्दाडम्बरमें पड़कर हम उसका सच्चा अर्थ भूलते जा रहे हैं। हमें चाहिए कि इसके शब्दार्थको ही पकड़े रहें; तब फिर हमें उसमें खादीके सिवाय और दूसरा कुछ नहीं मिलेगा । स्वदेशीका अर्थ है 'अपने देशका' । गाँववालोंके रोजमर्राके इस्तेमालकी चीजोंमें सिर्फ कपड़ा ही एक ऐसी चीज है जो 'अपने देशकी ' नहीं है । और जो चीज वे सहज ही तैयार कर सकते हैं, वह भी कपड़ा ही है। इसलिए स्वदेशीका जो काम वे सहज ही पूरा कर सकते हैं, और जिसके बिना उन्हें भूखों ही मरना पड़ेगा, वह केवल खादी ही का काम है - और कुछ नहीं । इसलिए सिर्फ खादीका काम सभी देशभक्तोंके लिए सच्चा स्वदेशीका काम है। इसलिए मैं आशा करता हूँ कि सेठ जमनालालजी और उनके साथी जहाँ कहीं जायेंगे, बंगालके लोग पूरे मनसे उनकी सहायता करेंगे। एक गज भी खादी खरीदनेसे और स्मारक कोषमें दिये गये छोटे-से- छोटे दानसे बहिष्कार आन्दोलनको और देशके गरीब से गरीब लोगोंको बहुत सहायता मिलेगी । बहिष्कार और विद्यार्थी एक कालेजके प्रधानाचार्य लिखते हैं : ' बहिष्कार आन्दोलनके संचालक विद्यार्थियोंको अपने आन्दोलन में खींच रहे हैं। जब लड़के अपने स्कूल और कालेज छोड़कर किसी प्रदर्शन में शामिल होते हैं, तब वे वहाँके हुल्लड़बाज लोगोंमें मिल जाते हैं और उन्हें बदमाशोंकी सभी ज्यादतियोंके लिए जिम्मेदार होना पड़ता है तथा अक्सर पुलिसके डंडे पहले उन्हें ही खाने होते हैं। इसके अलावा वे स्कूल या कालेजमें अधिकारियोंके कोप भाजन बन जाते हैं। और उन्हें दण्ड सहनेपर मजबूर होना पड़ता है; वे अपने अभिभावकों की हुक्म उदूली करते हैं; अभिभावक उन्हें आगे खर्च देनेसे इन्कार कर सकते हैं और इस तरह उनका सत्यानाश हो सकता है । में ऐसे युवक आन्दोलनोंकी बात तो समझ सकता हूँ कि लड़के छुट्टी के दिनोंमें निरक्षर किसानोंको पढ़ाने, उन्हें सफाईके नियम सिखलाने इत्यादिके काम करें; मगर यह देखकर तो कष्ट होता है कि वे अपने ही माँ-बाप और शिक्षकोंका विरोध करें और बुरे लोगोंके साथ सड़कोंपर घूमते फिरें और नियम और शान्ति- भंग करनेमें हाथ बँटावें । क्या मैं आपसे राजनीतिज्ञोंको यह सलाह देनेकी विनती कर सकता हूँ कि वे अपने प्रदर्शनोंको ज्यादा बाअसर बनानेके लिए विद्यार्थियों को उनके सही कामसे न खींच ले जायें ? ... पत्र-लेखकने इस आशासे पत्र लिखा है, कि मैं विद्यार्थियोंके सक्रिय राजनीतिक कामोंमें शरीक होनेका विरोध करूँगा । मगर खेद हैं कि मुझे उन्हें निराश करना १. पत्रके केवल कुछ अंश ही यहाँ दिये जा रहे हैं। Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१९९
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