टिप्पणियाँ संघर्षके बीच शान्ति १६९ एक मित्र समय-समय पर मेरे सोमवारके मौन दिवसके लिए जो सुन्दर चीजें भेजते हैं, उनमें से कुछ मैंने पहले भी पाठकोंके लिए छापी हैं। मैं उनके लिए एक और किश्त जो बहुत दिनोंसे मेरी बंडीमें पड़ी है प्रकाशित करनेको लालायित हूँ । अन्तिम दो को छोड़कर शेष सब बौद्ध लेखोंके उद्धरण हैं । अन्तिममें से पहला इमर्सनकी उक्ति है और अन्तिम एक हिन्दू कहावत है । उस मनुष्यके सुन्दर वचन जो स्वयं तदनुसार आचरण नहीं करता वैसे ही निरर्थक हैं, जैसे कि सुन्दर रंगवाला निर्गन्ध फूल । जीवनके उलट-फेरसे अविचलित, शोक एवं आवेशसे असंक्षुब्ध मन सबसे बड़ा वरदान है । जिसकी सदा ही प्रशंसा की जाती हो या जिसकी सदा ही निन्दा की जाती हो ऐसा व्यक्ति न कभी हुआ है और न कभी होगा । जैसे एक दृढ़ चट्टान वायुसे चलायमान नहीं होती, इसी प्रकार बुद्धिमान लोग निन्दा अथवा स्तुतिसे विचलित नहीं होते । जो हमसे घृणा करते हैं, उनसे घृणा न करके हम प्रसन्नतासे रहें । घृणा करनेवालोंके बीच घृणासे विमुक्त होकर रहें। हमें दुखितोंके बीच दुःखसे विमुक्त होकर सुखसे रहना चाहिए । मनमें सन्तप्त लोगोंके बीच मनस्तापसे विमुक्त होकर रहना चाहिए । व्यस्त लोगोंके बीच चिन्तासे विमुक्त होकर प्रसन्नता से रहें । चिन्तित लोगोंके बीच कामनाओंसे विमुक्त होकर रहें। यद्यपि हम किसी भी वस्तुको अपनी नहीं मानते, फिर भी हम प्रसन्नतासे रहें । हम उन दीप्तिमान देवताओंके समान बन जायेंगे जो आनन्दका उपभोग करते हैं । सबसे बड़ी प्रार्थना धैर्य है । इस संसार में घृणा कभी घृणासे शान्त नहीं होती । घृणा प्रेमसे शान्त होती है : यह सदा इसका स्वभाव है । मान एवं विनम्रता सन्तोष एवं कृतज्ञता, उपयुक्त समय पर ईश्वरकी वाणी सुनना सबसे महान् वरदान है । जैसे कोई माता अपने प्राणोंको संकटमें डालकर भी अपने पुत्र - 13 अपने इकलौते पुत्रकी रक्षा करती है, इसी तरह मनुष्यको सब प्राणियोंके बीच असीम सद्भाव बढ़ाना चाहिए। मनुष्य सारे संसारके प्रति, छोटे बड़ोंके प्रति असीम सद्भाव बढ़ाये; वह सद्भाव अपरिसीमित हो; इसमें विभिन्न या विरोधी हितोंका भाव न हो । मानव जितनी देर जागृत अवस्थामें रहे, चाहे वह खड़ा हो, चल रहा हो, बैठा हो या लेटा हुआ हो, सारे समय दृढ़तासे उसी मानसिक स्थितिमें रहे, मनकी यह स्थिति संसारमें सबसे अच्छी स्थिति है । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२०१
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