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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२०२

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१७० सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय तत्परता, निग्रह और संयमसे अपने आपको चैतन्य रखते हुए बुद्धिमान मनुष्य अपने लिए ऐसा द्वीप बना ले जिसे कोई भी प्रलय तबाह न कर सके । जैसे मधुमक्खी फूलके रंग और गन्धको क्षति पहुँचाये बिना उसका रस लेकर उड़ जाती है, इसी तरह बुद्धिमान मनुष्यको सत्यपर स्थिर रहना चाहिए। तूने मेरे होठोंको जहाँ एक वाणी दी है वहाँ हजार बार मौन रहना सिखाया है । एक बार बुद्ध भी गाड़ीका घोड़ा बने थे और उन्होंने दूसरोंका बोझा ढोया था । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, २९-३-१९२८ १८२. उपवासकी महिमा पाठक उस पोलिश प्रोफेसरके पत्रोंसे परिचित हैं जिनके उद्धरण मैं जब तब इस पत्रके स्तम्भों में प्रकाशित करता रहा हूँ। अपने एक पत्रमें मेरे उपवासोंके सम्बन्धमें वे लिखते हैं: मैं यह पत्र ऐसी खोजोंमें रुचि रखनेवाले पाठकोंके लिए उपयोगी समझकर छाप रहा हूँ । उपवाससे होनेवाले शारीरिक और नैतिक लाभोंको लोग दिनोंदिन अधिकाधिक मानते जा रहे हैं । बनिस्बत तरह-तरहकी दवाओं और भयंकर इन्जेक्शनोंके - - भयंकर इसीलिए नहीं कि उनसे तकलीफ होती है किन्तु इसलिए कि उनके फल- स्वरूप अक्सर और दूसरे रोग हो जाते हैं -- विवेकपूर्वक किये गये उपवासके द्वारा बहुतसे रोगोंका इलाज कहीं ज्यादा अच्छा और अक्सीर होता है। दवाओंसे होनेवाली बहुतेरी हानियोंको हम जानते ही नहीं हैं। मगर उपवाससे हुई हानिके उदाहरण विरल ही हो सकते हों । उपवास करनेवाले प्रायः सभी आदमियोंका अनुभव है कि इससे स्फूर्ति बढ़ जाती है, क्योंकि मन और शरीरको सच्चा आराम तो केवल उपवासमें ही मिल सकता है। अगर जरूरतसे ज्यादा भरा और शक्तिके बाहर काम करनेवाला पेट आराम न पावे तो महज शारीरिक काम बन्द कर देनेसे ही शरीरको आराम नहीं मिलता। उपवाससे आत्मिक लाभ भी पर्याप्त होते हैं किन्तु वे इस तरह सहज ही नहीं दिखलाये जा सकते। आत्मिक लाभ तभी होंगे, जब मन और देहका पूरा मेल हो । किन्तु इसमें आत्म-प्रवंचनाका खतरा है। मुझे ऐसे बहुतसे उदाहरण मालूम हैं जबकि आत्मिक लाभके लिए किये गये उपवास जरूरतसे अधिक दिनों तक चलाये जाते रहे। अगर उपवासी १. देखिए खण्ड ३३ " सत्य एक है", २१-४-१९२७ और खण्ड ३४ " अनेकतामें एकता ", ११-८-१९२७ । २. यहाँ नहीं दिया जा रहा है। पत्र लेखकने उपवासके अपने अनुभव लिखे थे और कहा था कि उससे न केवल शारीरिक स्कृति बढ़ती है, वरन् आध्यात्मिक लाभ भी अधिक होता है। ३. पत्र लेखकने लिखा था कि जब कभी मेरे सामने नैतिक या बौद्धिक कठिनाई पेश होती है, मैं उपवास करता हूँ.. ... एक बार छापाखाना वाला अन्य अधिक पैसा देनेवाली अन्य चीजें छापता रहा और उसने मेरे काममें देर लगा दी। मैंने उपवास किया और उनकी मनोवृत्ति बदलने में समर्थ हो सका...। Gandhi Heritage Portal