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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२०८

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१९०. मोक्षदाता राम' हम जिन रामके गुण गाते हैं, वे राम वाल्मीकिके राम नहीं हैं, तुलसी 'रामायण' के राम भी नहीं हैं - हालाँकि तुलसीदासकी 'रामायण' मुझे अत्यन्त प्रिय है और उसे मैं अद्वितीय ग्रन्थ मानता हूँ, तथा एक बार पढ़ना शुरू करनेपर कभी उकताता नहीं; तो भी हम आज तुलसीदासके रामका स्मरण करनेवाले नहीं हैं और न गिरधरदास के रामका । तब फिर कालिदास और भवभूतिके रामका तो कहना ही क्या ? भवभूतिके 'उत्तररामचरित' में बहुत सौन्दर्य है, किन्तु उसमें वे राम नहीं हैं जिनका नाम लेकर हम भवसागर तर सकें या जिनका नाम हम दुःखके अवसर पर लिया करें। मैं असह्य वेदनासे पीड़ित व्यक्तिसे कहता हूं कि 'राम नाम' लो'; अगर नींद न आती हो तो भी कहता हूँ कि, रामनाम लो' । किन्तु ये राम तो दशरथके कुँवर या सीताके पति राम नहीं हैं। ये तो देहधारी राम ही नहीं हैं। जो हमारे हृदयमें बसते हैं वे राम देहवारी हो ही नहीं सकते । अँगूठेके समान छोटा-सा तो हमारा हृदय और उसमें भी समाये हुए राम देहधारी क्यों कर हो सकते हैं, या किसी साल चैत्रकी नवमीको उनका जन्म हुआ ही नहीं होगा। वे तो अजन्मा हैं । वे तो सृष्टिको पैदा करनेवाले हैं, संसारके स्वामी हैं। इसलिए हम जिन रामका स्मरण करना चाहते हैं और जिनका स्मरण करना चाहिए वे राम हमारी कल्पनाके राम हैं, दूसरेकी कल्पनाके राम नहीं । इतना याद रखें तो हमारे मनमें जो अनेक प्रश्न उठा करते हैं वे न उठें। कितनी बार यह सवाल उठता है कि बालिका वध करनेवाले राम सम्पूर्ण पुरुष कैसे हो सकते हैं? मेरे पास भी ऐसे अनेक प्रश्न आते हैं। इसलिए मैं मन ही मन हँसता हूँ । किसीने अगर छल से या सीधी रीतिसे किसीको मारा अथवा दस सिरवाले किसी देहधारी रावणको भी मारा हो तो इसमें कौन-सा बड़ा काम कर लिया ? आजका जमाना तो ऐसा है कि बीस क्या, असंख्य भुजाओंका भी कोई रावण पैदा हो तो एक बालक तोपके एक ही गोलेसे उसके असंख्य हाथ और माथा उड़ा दे । उसे हम अलौकिक बालक नहीं मानेंगे। उसे हम बड़ा राक्षस मानेंगे। मैं मानता हूँ कि हम राक्षसके बड़े भाईके समान शक्ति पैदा करना नहीं चाहते। उसकी पूजा करनेसे हमें शान्ति नहीं मिलेगी। हम पूजा करें तो उस अन्तर्यामीकी, जो सबके भीतर है और साथ ही सबसे जुदा है और सबका स्वामी है। उन्हींके बारेमें हमने गाया कि 'निर्बलके बल राम' । इसमें तो 'द्रुपद-सुता निर्बल भई' की बात आई है। अब द्रौपदी और देहधारी रामका मेल कहाँ बैठेगा ? तो भी कविने गाया है कि द्रौपदीकी लाज रामने रखी। इसमें तो वही राम हैं जो सभीके हैं, तो भी जिन्हें कोई पहचान नहीं सकता। हम उसी रामका स्मरण करते हैं। इन अन्तर्यामी राम और कृष्णमें भेद नहीं है । २. आश्रम में राम नवमी के दिन दिये प्रवचनका सारांश । Gandhi Heritage Portal