सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२०९

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

मोक्षदाता राम १७७ रामनवमीका पर्व इसीलिए मनाया गया कि इसके निमित्त हम कुछ संयमका पालन करें, लड़के कुछ निर्दोष आनन्द लें और 'रामायण' पढ़कर कुछ सीखें। देहधारी मनुष्य परमेश्वरको दूसरे तरीकेसे सहज ही नहीं पहचान सकता । उसकी कल्पना अधिक दूर नहीं दौड़ सकती और इसलिए वह मानता है कि परमेश्वरने मनुष्य के रूपमें अवतार लिया था । हिन्दू धर्ममें उदारताका पार नहीं है। इसलिए वर्णन किया है कि परमेश्वरने मछली के रूपमें, वराहके रूपमें और नरसिंहके रूपमें अवतार लिया था। यों मनुष्यने देहाध्याससे ईश्वरकी कल्पना देहधारीके रूपमें की है और जब तब उसके अवतार लेनेकी कल्पना की है। कहा है कि जब धर्मका पतन हो और अधर्म फैल जाये तो ईश्वर धर्मकी रक्षा करनेके लिए अवतार लेता है। यह बात भी उसी तरह और उतनी ही हद तक सच्ची है, जितनी मैंने कही है। नहीं तो अजन्माका अवतार ही कैसा ? यह माननेका कोई कारण नहीं है कि कोई ऐतिहासिक पुरुष ईश्वरके रूपमें या ईश्वर किसी ऐतिहासिक पुरुषके रूप में अवतार लेता है । ईश्वरके सभी गुण किसी मनुष्य में हों तो यह माना जाता है कि ईश्वरने अवतार लिया। जो-जो महापुरुष हो गये हैं, उनके गुण देखकर मनुष्योंने उन्हें पूर्ण अथवा अंशावतार माना । और यह जानते हुए भी बाल्मीकिके या तुलसीदास के रामके निमित्तसे विभिन्न उपासक अपने ही भगवान्‌की महिमा गाते हैं। उनके उस भावनासे पूर्ण भजनोंको गाने में कोई दोष नहीं है । किन्तु मैंने जो बात पहले कही है आप उसे याद रखें तो भ्रमजालमें पड़नेका कोई कारण न रहे । हमारे सामने अगर कोई शंकाएँ रखकर हमें उलझनमें डालना चाहे तो उसे कहें कि हम किसी देहधारी रामकी पूजा नहीं करते हैं। हम तो अपने निरंजन, निराकार रामको पूजते हैं । हम उसके पास सीधे नहीं पहुँच सकते, इसलिए जिनमें ईश्वरकी मूर्तिमन्त कल्पना की गई है, उन भजनोंको गाते हैं । जबतक हम देहकी दीवारके पार नहीं देख सकते, तबतक सत्य और अहिंसाके गुण हममें पूरे-पूरे प्रकट होनेवाले नहीं हैं । जब सत्यके पालनका विचार करें तब देहाध्यास छोड़ना ही चाहिए, क्योंकि सत्यके पालनके लिए मरना जरूरी होगा । अहिंसाकी भी यही बात है । देह तो अभिमानका मूल है। देहके बारेमें जिसका मोह बना हुआ है, वह अभिमानसे मुक्त हो ही नहीं सकता। जबतक मेरे मन में यह विचार है कि देह मेरी है, तबतक मैं सर्वथा हिंसामुक्त हो ही नहीं सकता हूँ । जिसकी अभिलाषा ईश्वरको देखनेकी है, उसे देहके पार जाना पड़ेगा, अपनी देहका तिरस्कार करना पड़ेगा, मौतसे भेंट करनी पड़ेगी । जब ये दो गुण मिलें तभी हम तर सकेंगे । ब्रह्मचर्यादिका पालन कर सकेंगे। अगर उनका पालन करना चाहें तो सत्यके बिना कैसे चलेगा? सत्यका मुख तो सुवर्णमय पात्रसे' ढँका हुआ है। सत्य बोलने, सत्यके आचरण करनेका डर क्यों हो ? असत्यरूपी चमकीला ढक्कन जबतक दूर न करें तबतक सत्यकी झाँकी क्योंकर होगी ? कोई कसूर करे तो उस पर क्रोध करनेके बदले प्रेम करना क्या हमें रुचता है, हम संसारको असार कहकर गाते हैं सही, मगर क्या उसे असार समझते भी हैं ? १. ईशोपनिषद, ५-१५ | ३६-१२ Gandhi Heritage Portal