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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२१२

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१९३. पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको आश्रम साबरमती प्रिय शान्तिकुमार, ३१ मार्च, १९२८ आपका पत्र मिला। वे शर्तें जो मेरी समझ में मिल मालिकोंको मान लेनी चाहिए, निम्नलिखित हैं : ( १ ) कीमतोंका नियमन सब हितोंका प्रतिनिधित्व करनेवाली विशेष समिति द्वारा किया जाना चाहिए। (२) किस किस्मका और कितना उत्पादन हो, इसकी व्यवस्था भी उसी समिति द्वारा की जानी चाहिए। (३) मिलें खादीके नामपर बना कोई भी मिलका कपड़ा बेचना बन्द कर दें । वे शर्तोंके स्वीकार करनेकी तारीखसे ज्यादासे ज्यादा तीन महीनोंके अन्दर ऐसा कोई भी कपड़ा बनाना भी बन्द कर दें जो खादीसे मुकाबला कर सके और इस उद्देश्यसे समिति समय- समयपर यह निश्चय करती रहेगी कि मिलोंको कैसा कपड़ा नहीं बनाना चाहिए। (४) मिलें केवल मिल-कपड़े विक्रय ही का प्रबन्ध नहीं करेंगी परन्तु वे इस प्रकारसे चलाई गई एजेंसियों द्वारा खादी भी बेचेंगी । (५) मिलें विदेशी सूत, विदेशी रेशम, विदेशी ऊन और नकली रेशम इस्तेमाल नहीं करेंगी । (६) मिलें विदेशी वस्त्र बहिष्कार आन्दोलनसे पूरी तरह एकात्मता स्थापित कर लेंगी और इस उद्देश्यके लिए कपड़ा व्यापारियों, दूसरे दलालों और रूईके बाजार पर जहाँतक हो सकेगा अधिकार प्राप्त करनेमें अपनी पूरी शक्ति लगायेंगी । (७) यदि मिलोंके साथ स्पष्ट समझौता हो जाये तो खादी भण्डार स्वाभाविक रूपसे, उक्त समिति द्वारा नियत शर्तोंके आधार पर मिल कपड़ेकी विक्रीकी एजेंसियाँ बन जायेंगे । (८) मिलें उस समितिको वह निधि सौंप दें, जिसकी समय-समय पर प्रचारके लिए आवश्यकता पड़ती रहेगी । मेरे विचारमें यह रकम एक लाख रुपयेसे ज्यादा नहीं होनी चाहिए । यह पत्र जल्दीमें लिखवाया जा रहा है। इसलिए यदि इन शर्तोंमें कोई कमी रह गई हो तो उसे आप कृपया 'यंग इंडिया' के दो अंकोंमें बताई गई शर्तोंसे पूरा १. देखिए "हमारी मिलें क्या कर सकती है?” १५-३-१९२८ और " विदेशी वस्त्र बहिष्कार : कुछ प्रश्न", २२-३-१९२८ । Gandhi Heritage Portal