१९५. सत्याग्रहियो सावधान ! जब हंटर कमेटीके एक सदस्यने जनरल डायरसे जलियाँवाला बागके कलके बारेमें प्रश्न पूछा " क्या तुम्हारा विचार नादिरशाही चलाकर लोगोंके मनमें सरकारका रोव जमाना, भय पैदा करना था ? " तब जनरल डायरने इस बातको उत्साहपूर्वक स्वीकार करते हुए कहा, "हाँ" किन्तु नादिरशाहीका आरम्भ कोई जनरल डायरसे शुरू नहीं हुआ था । यह तो भारतीय नौकरशाहीको परम्परासे प्राप्त है और इसपर उसका एकाधिकार है। लेकिन यह कहा जा सकता है कि इस नादिरशाहीने चूंकि जनरल डायरको विख्यात कर दिया है, इसलिए हम उसे डायरशाही के नामसे भी जानने लगे । डायरशाही नीतिके ऊपर ही नौकरशाहीका अस्तित्व निर्भर है। इसलिए अवसर आनेपर उसका आश्रय लेनेसे वह नहीं चूकती । उसके लेखे बारडोली में ऐसा ही अवसर उपस्थित है । इसलिए डरपोक या कायर माने जानेवाले बनिया सत्याग्रहियों पर नादिरशाही की आजमाइश शुरू कर दी गई है। इस प्रकार आठ बनिया सत्याग्रहियों के पास यह नोटिस पहुँचा है कि यदि वे १२ अप्रैलसे पूर्व नोटिस में बताई गई जमीनका लगान अदा नहीं करेंगे तो वह सारी जमीन जब्त कर ली जायेगी। एक बनिया सज्जनके नोटिसमें जमीनका लगान १६० रुपये बताया गया है। यदि सरकार १६० रुपयेकी कीमतकी जमीन ही जब्त करती तो कदाचित उसका ज्यादा दोष न माना जाता । परन्तु १६० रुपयेके लिए हजारों रुपयोंकी जमीन जब्त कर लेना तो नादिर- शाही ही है। इस राज्यकी नीतिमें कई बार तमाचेका उत्तर तमाचेसे नहीं वरन् फाँसीसे दिया जाता है। एक रुपयेका लेनदार एक हजार रुपये ले ले तो उसे जालिम या दस सिरवाला रावण ही कहेंगे । अग्रिम बुद्धि माने जानेवाले वैश्य इसका क्या जवाब देंगे ? अपनी भीरुता सिद्ध करके दिखायेंगे या सत्याग्रही सेनामें सम्मिलित होनेकी अपनी योग्यता ? वल्लभभाईने एक बार नहीं अनेक बार यह चेतावनी दी है कि सरकार कायदा बनाकर जमीन जब्त करने और जेल भेजनेके अधिकार प्राप्त कर चुकी है। और उसने अनेक बार यह सिद्ध भी कर दिया है कि वह अपने इन अधिकारों पर अमल करते हुए तनिक भी संकोच नहीं करेगी। इसलिए जब्तीके इस नोटिससे वे और दूसरे व्यक्ति भयभीत न हों। वे विश्वास रखें कि इस प्रकार जब्त की गई जमीन सरकारको नहीं पचेगी और उस जमीनको नीलामी में खरीदनेवाला कोई देशद्रोही निकल भी पड़ा तो वह उसको भी नहीं पचेगी। इस प्रकार लूटी हुई जमीन कच्चे पारेके समान है; वह फूटकर निकल ही जायेगी । जमीन अपने वचन और अपनी प्रतिष्ठासे बढ़कर कदापि नहीं है। ऐसे असंख्य मनुष्य देशमें हैं जिनके पास जमीन नहीं है। कई जमीनवालोंकी भूमि पिछली बाढ़में डूब गई थी और अब उसके ऊपर रेत जमी पड़ी है। गुजरातियोंने जिस प्रकार इस Gandhi Heritage Portal
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