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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२१५

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राष्ट्रीय सप्ताह १८३ आसमानी प्रकोपका धीरज और वीरतापूर्वक सामना किया वैसे ही बारडोलीके सत्याग्रही इस सुल्तानी बाढ़का सामना करते हुए अपनी प्रतिज्ञाका पालन करें। [ गुजरातीसे ] नवजीवन, १-४-१९२८ १९६. राष्ट्रीय सप्ताह आगामी राष्ट्रीय सप्ताह नौवाँ राष्ट्रीय सप्ताह है। इस सप्ताहमें लोगोंकी उत्तरोत्तर प्रगतिका हिसाब लगाया जाना चाहिए। किन्तु इसमें हमें कई जगहों पर निराशा ही दिख रही है । यह सप्ताह हमारे लिये राष्ट्रीय तलपट निकालनेका, आत्म- निरीक्षण करनेका, आत्मशुद्धि करनेका, हिन्दुओं, मुसलमानों और पारसियों आदिका हृदय एक करनेका, हिन्दुओंके लिए अस्पृश्य माने जानेवाले भाइयों और बहनोंसे भेंट करने और उनकी सेवा करनेका और हिन्दुओं, मुसलमानोंके लिए खादीधारी बनकर विदेशी कपड़ेका बहिष्कार करनेका है। किन्तु ऐसा लगता है कि हम राष्ट्रके इन पोषक अंगोंको अब भूल गये हैं । भिन्न-भिन्न विषयोंमें जिन लोगोंकी श्रद्धा है उनके सम्बन्धमें वे तो प्रयत्न कर ही रहे हैं । किन्तु इन कार्योंको अब व्यापक रूप नहीं दिया जाता। पहले सबके मुँहपर यह बातें रहती थीं कि इन कार्योंके किये बिना स्वराज्य नहीं मिल सकता, किन्तु आज हमें वैसी बात सुनाई नहीं देती । राष्ट्रीय सप्ताहमें इस स्थितिको बदलनेका प्रयत्न किया जाना चाहिए। ऐसा प्रयत्न सब लोग और सभी राष्ट्रीय संस्थाएं चाहे न भी करें, फिर भी इन रचनात्मक कार्यों में जिनकी अविचल श्रद्धा है वे तो अपनी ओरसे महान् उद्योग अवश्य करें । ऐसे प्रयत्नोंसे ही एक व्यापक प्रवृत्ति उत्पन्न होगी और अवश्य उत्पन्न होगी, इस सम्बन्ध में कोई भी शंका न करें । खादीका कार्य बालकों, स्त्रियों और पुरुषों, हिन्दुओं और मुसलमानों सभीके करने योग्य कार्य है। यह वे अपनी आँखोंसे देख सकते हैं । बहिष्कारकी चर्चा चारों ओर चल रही है । किन्तु ऐसा जान पड़ता है कि हम बहिष्कारके सम्बन्ध में अभी भ्रममें पड़े हैं। कोई कहता है अंग्रेजी मालका बहिष्कार करो, कोई कहता है सिर्फ अंग्रेजी कपड़ेका बहिष्कार करो और वह भी समझौता होने तक ही, कोई कहता है कि हर तरहके विदेशी कपड़ोंका बहिष्कार करो। ये सभी कार्य ऐसे हैं जो साथ- साथ नहीं किये जा सकते। पहले दो कार्योंकी बीस साल तक पुकार हुई । तब सन् १९२० में लोगोंने लम्बे विचारके बाद यह देखा कि एक ही बहिष्कार सम्भव और कर्तव्य है -- वह है विदेशी कपड़ेका बहिष्कार और वह भी खादीकी मार्फत । फिर इस विदेशी कपड़ेके बहिष्कारकी कल्पनाके मूलमें कोई शर्त नहीं है, बल्कि वह सदाके लिए है । और जो कार्य सदाके लिए हो वह कम होनेपर भी लाभदायक ही होता है । जिस कार्यके लिए जो शर्त होती है उसके उचित मात्रामें पूरे होनेपर ही फल Gandhi Heritage Portal