१८४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय मिलता है और तभी वह कार्य लाभदायक होता है। शर्तके थोड़ी मात्रामें फलनेपर कार्य हानिप्रद भी हो जाता है। इसलिए हमें इस भ्रमसे निकल जाना चाहिए और विदेशी कपड़ेके बहिष्कारके लिए अथवा यह कहना चाहिए हिन्दुस्तानके गरीबोंकी खातिर खादीके प्रचारका सतत प्रयत्न करना चाहिए। इस प्रचारके लिए सब लोग १. जो स्वयं खादी न पहनते हों, वे स्वयं खादी पहनें और दूसरे खादी न पहननेवालोंसे खादी पहनने को कहें। २. जितना का सकें उतना सूत कातें और दूसरोंको भी वैसा करनेकी प्रेरणा दें और ३. इस कार्यके निमित्त जितना धन दे सकें उतना धन दें और पड़ोसियोंसे भी इकट्ठा करें। इस विषय में भाई विठ्ठलदास जेराजाणीका लेख विचार करने योग्य है ।" [ गुजरातीसे ] नवजीवन, १-४-१९२८ १९७, टिप्पणियां उड़ीसा की दुर्दशा धूलमें मरते हुए, धूल में भाई और बहन मैं छगनलाल गांधीके एक पत्रका कुछ भाग दे रहा हूँ," पाठकोंको याद रखना चाहिए कि ये भटकते हुए और भूखे से केलेके फेंके हुए छिलके बीनकर खानेवाले लड़के हमारे अपने ही हैं। यदि हम भारतको अपनी माता कहकर गर्वका अनुभव करते हैं तो हमें इन उत्कलके भटकते हुए बालकोंको अपना भाई और बहन मानना ही होगा। इनका स्वराज्य क्या हो सकता है? यदि उन्हें हम स्वराज्यकी व्याख्या करनेको कहें तो वे क्या बतायेंगे ? क्या हम उन्हें भीखमें कच्चे चावल देकर उनका पेट भरेंगे ? क्या हम उनको धूलसे केलेके छिलके बीनकर खाने देंगे ? क्या उन्हें हम बासी अन्न खाने देंगे ? अथवा हम उन्हें उद्यमी बनायेंगे और कोई धन्धा सिखाकर मनुष्य बना- येंगे ? मेरी अल्पबुद्धि तो यह कहती है कि उड़ीसा के इन भूखे मरते हुए लोगों के त्राणका कोई उपाय खोजनेमें ही स्वराज्य छिपा हुआ है । सस्ती खादी राँची रोडके शुद्ध खादी भण्डारके व्यवस्थापकने यह विज्ञप्ति भेजी है : १. देखिए, " टिप्पणियाँ " २९-३-१९२८ का उप-शीर्षक, खास राष्ट्रीय सप्ताहके लिए "। २. यहाँ नहीं दिया जा रहा है। पत्रमें उड़ीसा अकालका विवरण था। ३. यह विज्ञप्ति यहाँ नहीं दी जा रही है। इसमें कहा गया था कि ६ अप्रैलसे १३ तक दुकानसे २५ प्रतिशत कम दामपर खादी बेची जायेगी। Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२१६
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