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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२२४

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१९२ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय काका साहबको पहली जूनको उनकी जरूरत पड़ेगी। और इससे पहले वह अपने परिवारको लानेके लिए कालीकट जाना चाहेंगे । तुम्हारे अपने मानदेयके सम्बन्ध में, अब तक मुझे ठक्कर बापाका पत्र मिल गया है । ठक्कर बापा कहते हैं कि तुमने उन्हें भी बताया था कि तुम १५० रु० से ज्यादा नहीं लेना चाहोगे। यह क्या है? मुझे रु० २०० लेनेमें कोई एतराज नहीं दिखता। परन्तु मैं जानना चाहता हूँ कि तुम पहले रु० १५० पर राजी क्यों थे और बादमें तुम्हें अपनी माँग क्यों बढ़ानी पड़ी? मैं चाहता हूँ कि हम सब सोच-समझकर काम करें और जो कुछ तय करें उसपर दृढ़ रहें। अपने पुनरुद्धारकी आशा मुझे इसी बात में दिखाई देती हैं कि हममेंसे कमसे कम कुछ लोगोंमें निर्णय करनेकी और सोच-विचार करनेकी शक्ति तथा अन्य ऐसे गुण विकसित हों। तुम इसको अन्यथा न लेना । और रु० १५० पर ही तबतक फिरसे राजी न हो जाना जबतक कि तुम्हारे लिये सहायता कार्य करते हुए सचमुच वैसा सम्भव न हो। यदि तुम्हें ऐसा लगे कि तुमसे भूल हो गई है या तुमने श्रीमती मलकानी और दूसरे सम्बन्धित लोगोंसे पूर्वानुमति लिये बिना डेढ़ सौ रुपया लेनेको कह दिया था, तो तुम यह विनम्रता- पूर्वक अवश्य स्वीकार कर लो और दो सौ माँगो। तुम समझ ही रहे होगे कि मैं यह सब किसलिए लिख रहा हूँ या तुम नहीं समझ रहे हो ? मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी आशाके अनुरूप सिद्ध होओ। श्रीयुत ना० र० मलकानी अंग्रेजी (जी० एन० ९२७) की फोटो नकलसे । हृदयसे तुम्हारा, बापू Gandhi Heritage Portal