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२१०. पत्र : ए० ए० पॉलको आश्रम साबरमती प्रिय राजन्, ४ अप्रैल, १९२८ आपने मुझसे बड़ा कठिन प्रश्न पूछा है । परन्तु आपकी पूरी दलीलपर बड़े ध्यानसे गौर करनेके बाद मेरा यह मत है कि फैलोशिपसे सम्बन्धित तमाम अवधिके कामके लिए आपको मानदेय स्वीकार कर लेना चाहिए। यदि आपका ध्यान दो न्यासोंके बीच बटा रहा, तो आप इसमें अपना चित्त नहीं लगा सकेंगे। एक या दूसरेकी या दोनोंकी हानि ही होगी, विशेष कर जब दोनोंमें अक्सर संघर्ष होनेकी सम्भावना हो । इस सिद्धान्तके आधारपर कि मजदूरको उसकी मजदूरी मिलनी चाहिए, अपने फैलोशिपके कामके लिए आपके मानदेय स्वीकार कर लेनेमें मुझे कोई नैतिक आपत्ति नहीं दिखती। श्रीयुत ए० ए० पॉल ७ मिलर रोड किल्पॉक मद्रास अंग्रेजी (एस० एन० १३१६०) की फोटो - नकलसे । हृदयसे आपका, ३६-१३ Gandhi Heritage Portal