२१३. भाषण : आश्रमकी प्रार्थना सभामें [४ अप्रैल, १९२८ ] हनुमानके अनुकरण करनेकी दिशामें पहला पाठ यह है कि हम जो भी काम कर रहे हों, उसीमें सारा ध्यान लगा दें। यह करनेके लिए आँखें निश्छल और सच्ची रखनी चाहिए। आँखें सारे शरीरका दीपक हैं और उसे आत्माका दीपक भी कह सकते हैं। क्योंकि जबतक शरीरमें आत्मा है, तबतक आँखसे उसकी परीक्षा हो सकती है। मनुष्य शायद अपने वचनसे आडम्बरपूर्वक अपने आपको छिपा सकता है, मगर उसकी आँखें उसे जाहिर कर देंगी। उसकी आँख सीधी और निश्छल न हो तो अन्तर परख लिया जायेगा। जिस भाँति जीभकी परीक्षा करके हम शरीरके रोग परखते हैं; उसी भाँति आँखकी परीक्षा करके आध्यात्मिक रोग परखे जा सकते हैं। इसलिए लड़कोंको बचपनसे ही आँखें निश्छल रखनेकी टेव डालनी चाहिए । हनुमानकी आँखें निश्छल थीं। उनसे सदा यह प्रकट होता था कि रामका नाम जिस तरह उनके मुंहमें था, उसी मांति हृदयमें भरा हुआ था, उनके रोम-रोममें व्याप्त था । हम अखाड़ों में हनुमानकी जो स्थापना करते हैं वह मुझे अच्छा लगता है मगर इसका अर्थ यह नहीं है कि हम केवल शरीरसे ही बलवान होना चाहते हैं या, हनुमानके केवल शरीर बलकी ही आराधना करते हैं । शरीरसे जरूर बलवान् बनें मगर साथ ही यह भी जान लें कि हनुमानका शरीर राक्षसी न था; वे तो वायुपुत्र थे, यानी उनका शरीर फूलके समान हलका था, और तो भी कसा हुआ था । किन्तु हनुमानकी विशेषता, उनके शरीरबलमें न थी; उनकी भक्ति में थी । वे रामके अनन्य भक्त थे, उनके दास थे । रामके दासत्वमें ही उन्होंने सर्वस्व माना और उन्हें जो कोई काम सौंपा गया, उसे वायुकी गतिसे किया। इसलिए हम हनुमानकी जो आराधना करते हैं, हम व्यायाम शालामें हनुमानकी जो स्थापना करते हैं, वह इस अर्थ में कि ब्यायाम करके भी हम भारतवर्षके दास, जगतके दास और उसीसे ईश्वरके दास बननेवाले हैं। इस दासत्वमें हमें परमेश्वरकी झाँकी मिलेगी । इसलिए हम यह भी न कहें कि हम केवल ब्रह्मचर्यके आदर्शके लिए ही हनुमानकी आराधना करते हैं। सभी सेवकोंको ब्रह्मचर्यंका पालन अवश्य करना ही होगा । जिसने सेवाका व्रत लिया, वह भला विषयोंका सेवन कैसे कर सकेगा ? पिता-माताकी सेवा जैसी संकुचित सेवाके लिए भी पुत्रके संयमी बननेकी आवश्यकता है। जैसा विषयी मैं बना था, वैसा बनकर यह सेवा नहीं की जा सकती। उसी तरह जिसे आश्रमकी सेवा करनी है, स्त्री-पुरुषों, बालक-बालिकाओंकी सेवा करनी है, उसके लिए १. प्रजाबन्धुर्मे दिये गये विवरणके अनुसार यह भाषण हनुमान जयन्तीके अवसरपर दिया गया था। २. देखिए खण्ड ३८ । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२२७
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