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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२२९

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२१४. अछूतोंको याद रखो इस अंक के प्रकाशित होनेके बाद दो दिनोंके भीतर राष्ट्रीय सप्ताह आ जायेगा । आत्मशुद्धिकी प्रक्रियामें हम किसी समय शराब-ताड़ीकी दुकानों पर धरना देते थे । कोयम्बटूरकी आदि द्राविड़ सभाके सदस्यों द्वारा दिये गये मानपत्रके इस अंश' को पढ़ते समय मेरे मनमें (सन् १९२१ के) उसी जमानेकी याद हो आती है : •. मगर पुरानी हालत जरा भी नहीं बदली है। दूसरे हिन्दू हमारी आत्मासे भी घृणा करते हैं। यहाँ तक कि हम लोग मन्दिरों में परमात्माकी पूजा भी नहीं कर पाते ।... हमारे लिये गिरजाघरों और मस्जिदोंके दरवाजे बराबर खुले हैं और उनकी देखरेख करनेवाले मिशनरी हमारा खुले दिलसे स्वागत करते हैं। हम लोगोंके रहने की जगहों, 'चेरियों' के भीतर ही या उनके निकट शराब की दुकानें खोलकर सरकार हमारे नवयुवकोंको प्रलोभन में डालती है। अगर इन दुकानोंके बदले उद्योगशालाएँ खुल जायें, और आबकारी ठेकेदारोंके बदले समाज-सेवक लोग हमपर कृपादृष्टि डालें, तो हमें जरा भी शक नहीं है कि हमारी दशा बहुत थोड़े ही समय में सुधर जायेगी । इसलिए हम आपसे हार्दिक आग्रह करते हैं कि आप हमारी जातिको सर्वनाशसे बचाने के लिए हमारी चेरियोंके भीतर या उनके निकट औद्योगिक शालाएँ खुलवाने में मदद करें। राष्ट्रीय सप्ताहमें हमें इस बातपर विचार करने की जरूरत नहीं है कि सरकारने क्या किया है और क्या नहीं किया है । किन्तु हमें इसपर जरूर विचार करना है कि हमने क्या किया है और क्या कुछ और कर सकते हैं। इसमें तो कोई शक ही नहीं है कि अस्पृश्यताके विरुद्ध लोकमत दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है, फिर भी उस दिशामें सार्वजनिक प्रयत्न अभी निर्बल ही हैं। अभी तक हम पुजारियोंको दलित वर्गोंके लिए सार्वजनिक मन्दिरोंके दरवाजे खोलनेके लिए भी राजी नहीं कर सके हैं, और न एक भी शराब या ताड़ीकी दुकानके बदले औद्योगिक शाला या ऐसा जलपान- गृह खोल सके हैं,, जहाँपर उन्हें उस गर्म, उत्तेजक शराबके बदले पौष्टिक पेय और स्वच्छ परिस्थितियोंमें स्वास्थ्यकर वस्तुएँ खानेको मिल सकें । अंग्रेजी से ] यंग इंडिया ५-४-१९२८ १. केवल कुछ अंश ही यहाँ दिये जा रहे हैं। Gandhi Heritage Portal