२१५. बाघात रियासत और जनेऊ गत २२ मार्चके 'यंग इंडिया' में वाघात रियासतमें कोलियोंके साथ वर्तावपर, मेरी टिप्पणीके' सिलसिले में नई दिल्ली आर्य समाजके सभापति लिखते हैं: -- पत्र-लेखक सभापति महोदय, और कोई नहीं, दिल्लीके नामी परोपकारी समाज- सेवी कार्यकर्त्ता राय साहब लाला गंगाराम हैं। लाला गंगारामके पत्रसे तो इन पृष्ठोंमें प्रकाशित पत्रमें लगाये गये इल्जामोंकी सच्चाईके बारेमें कोई शक नहीं रह जाता है । मैंने आशा की थी कि शायद उनको सूचना देनेवाले लोगोंने बाघात रियासत में हुई वारदातोंको बढ़ा-चढ़ा कर कहा हो और तथाकथित अछूतोंको जनेऊ पहनना रियासतने गुनाह करार न दिया हो। मेरे सामने रियासत के प्रधान मन्त्री द्वारा लाला गंगारामके नाम लिखे पत्रकी नकल है । पत्र इस प्रकार है : १० जनवरी, १९२८ के आपके पत्रके जवाब में मुझे खदके साथ कहना पड़ता है कि इस मुकदमेमें चूंकि आर्य समाज एक पक्ष नहीं था, इसलिए आपको रियासत की ओरसे उस फैसलेकी नकल नहीं दी जा सकती। मैं यह कहे बिना नहीं रह सकता कि जवाब देनेका ढंग बहुत ही बुरा है। वह कुछ अंग्रेज अफसरोंके अत्यन्त नपे-तुले और एक ही करके पत्रोंकी भौंड़ी नकल है, जो जरा टेढ़े सवाल पूछनेवालोंको भेजे जाते हैं। परन्तु ये माननीय सज्जन साधारणतः प्रतिष्ठा और पद की इज्जत करते हैं तथा जवाब देनेसे बचनेके लिए भद्दे तौरपर नई बातें पैदा नहीं करते हैं। बाघात रियासतके प्रधानमन्त्रीने समाजमें लाला गंगारामकी स्थिति (मेरा मतलब उपाधिको छोड़कर उनकी स्थितिसे है ) की उपेक्षा करनेका दुःसाहस किया है और उन्हें अपमानित करनेके लिए वैसी बातोंकी कल्पना कर ली है, जिनका जिक्र तक लाला गंगारामने अपने पत्र में नहीं किया था। क्योंकि उन्होंने न तो फैसलेकी नकल माँगी थी और न बेचारे कोलियों के मुकदमें में शरीक होनेका ही दावा किया था। यह मामला दर असल हिन्दू महासभाको अपने हाथोंमें लेना चाहिए। मुझे पता नहीं है कि महासभा तथाकथित अछूतोंका जनेऊ पहनना पसन्द करती है या नहीं। वह पसन्द करे या न करे, किन्तु पहननेवालोंपर अत्याचार किया जाना तो वह कभी पसन्द नहीं कर सकती । यज्ञोपवीत ज्यों ही कुछ खास लोगोंका इजारा हो जाता है तथा उस इजारेको भंग करनेवालोंको दण्ड दिया जाता है, उसकी पवित्रता नष्ट हो जाती है। यह पवित्र तब था और इसलिए था कि इसे धारण करनेवाले पुरुष विद्वान और पवित्र होते थे। अगर बाघात रियासतकी जो बात कही जाती है उसका असर दूसरोंपर भी पड़ने लग जाये तो फिर शीघ्र ही यह अवनतिका चिह्न बन जायेगा । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, ५-४-१९२८ १. देखिए "टिप्पणियों, २२-३-१९२८ का उप-शीर्षक "वया यह सच हो सकता है "। २. पत्र नहीं नहीं दिया जा रहा है। Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२३०
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