सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२३३

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

२१८. बहिष्कार पर एक मिल-मालिक अहमदाबादके एक मिल-मालिक लिखते हैं : यह पत्र मनको ताजगी देनेकी हद तक निश्छल है। अगर दूसरे मिल-मालिक भी इस पत्र लेखककी तरह चीजोंके दाम स्थिर करने और फलस्वरूप कपड़ोंके दाम निश्चित कर डालनेकी सम्भावनाके बारेमें सोचते, तो क्या ही अच्छा होता। यह जानकर भी अच्छा लगा कि कपासकी कीमतोंमें घट-बढ़ होनेका कपड़ेके दामपर कोई खास फर्क नहीं पड़ता । यद्यपि पत्र लेखकका मत मेरे इस मतसे भिन्न है, फिर भी मैं यह कहूँगा कि अगर हम विदेशी वस्त्रका बहिष्कार कर सकें तो हम कपासके भावपर भी अंकुश रख सकेंगे । हमारी रुईके भावके मामलेमें अमेरिकाकी इसलिए चलती है कि हम अपनी बहुत-सी रुई बाहर भेजते हैं और वह भी उन्हीं देशों में जहाँ अमेरिका अपनी रुई बेचता है। अगर हम कपड़ा खरीदनेवालेसे उसकी देश- भक्तिके नामपर आग्रह करना सम्भव मानें, जैसा कि वह सम्भव साबित हो चुका है, तो कपास उपजानेवालेसे देशभक्तिके नामपर आग्रह करना उतना ही सम्भव है । वास्तवमें विदेशी वस्त्र के बहिष्कारका महत्व भी इसीलिए है कि उसकी सफलता के लिए राष्ट्रके सभी अंग उसमें स्वेच्छापूर्वक शामिल हों। जबतक गाँवोंका विशाल जन-समूह उसमें खुशीसे और पूरे मनसे साथ न दे, वह सफल नहीं हो सकता। इस आन्दोलनमें मेरा विश्वास इसीलिए अडिग बना है कि मैं जानता हूँ कि गाँवोंकी आम जनता समझदार है । रास्ता तो केवल दूसरे ही वर्गोंके लोग रोकते हैं, क्यों कि उनमें श्रद्धाकी कमी है। यदि वे अपना भय और अश्रद्धा त्याग दें तो जनता उनका अनुसरण करेगी। केवल यही एक ऐसा बहिष्कार है, जिसमें जनता बिना बहुत बड़ा त्याग किये, सक्रिय रूपसे हिस्सा ले सकती है । मैं पत्र - लेखकसे इस बात में सहमत नहीं कि हमारी मिलोंमें कपड़ा बनानेके लिए नकली रेशम बेखटके काममें लाया जा सकता है। नकली रेशमकी तुलना विलायती रंग या माँडीके साथ करनेमें जल्दबाजी की गई है। अभी तो हम केवल विदेशी कपड़ेका बहिष्कार करना चाहते हैं, न कि विदेशी रंगों या माँडीका । इसीलिए सभी किस्मके विदेशी धागे, चाहे वे असली या नकली रेशम, ऊनी या सूतके हों, त्याज्य होने चाहिए । अगर हम विदेशी नकली रेशमी धागेके इस्तेमालको बेखटके काममें लानेकी छूट दे दें, तो फिर विदेशी सूती या ऊनी या असली रेशमी धागेकी भी छूट क्यों न दें ? मगर विदेशी रुईकी बात इससे बिलकुल जुदा है। हमें विदेशी रुईका बहिष्कार करनेकी जरूरत नहीं है, क्योंकि वह कच्चा माल है । हमें उस भूखों मरती जनताके लिए, जो सालमें ४ महीने थोपी गई बेकारीमें रहती है, उस मालका बहिष्कार अवश्य १. पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है। Gandhi Heritage Portal