२०२ -- सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय ही करना चाहिए - वह है विदेशी सूत और कपड़ा; इसे हमारी जनता अपनी झोंपड़ियोंमें स्वयं कात और बुन सकती है । स्वदेशी मिलोंका कपड़ा भी अगर इस जनताको दूसरा ऐसा ही काम दिये बिना उनकी रोजी छीन ले, तो हम उसे भी सहन न करें। राष्ट्रीय जीवनकी अर्थ-व्यवस्थामें मिलोंका इतना ही स्थान है कि वे करोड़ों घरोंमें चलनेवाले हाथ - कताईके हमारे राष्ट्रीय उद्योगके शेष कामकी पूर्ति करें। मिलें अगर उन्हींसे मुकाबला करने लगें और उनकी जगह लेने लगें, तो वे बाधा-स्वरूप बन जायेंगी। उनकी स्वाभाविक प्रकृति तो गाँवके कर्तयों और बुनकरोंकी जगह ले लेनेकी ही है। मिल-मालिक, मिल- एजेंट और उनके हिस्सेदार जिस दिन सच्चे अर्थोंमें राष्ट्रीय बन जायेंगे और जनताको लूटनेके लिए नहीं, बल्कि उनके हितको पहला और अपने लाभको दूसरा स्थान देकर अपना धन्धा चलायेंगे, उसी दिन वे बहिष्कार आन्दोलनका अर्थ समझ सकेंगे और तब उसमें वे न सिर्फ शरीक ही हो सकेंगे बल्कि उस आन्दोलनका नेतृत्व करेंगे । यह तो ऊपरके पत्र में स्पष्ट कर दिया गया है कि अगर वे दूरदर्शितासे काम लें तो उन्हें हानि तो कुछ होगी नहीं, लाभ बहुत कुछ होगा । सचमुच में यह एक स्वयं सिद्ध बात है । विदेशी कपड़ेके बहिष्कारसे अगर जनताको निरन्तर काम मिलते जाना निश्चित हो जाता है तो उससे आगे चलकर मिलोंको भी लाभ होना निश्चित हो जाता है । मगर कमसे-कम पिछले सात सालोंमें जन आन्दोलन के दौरान मिल-व्यवसायके इतिहासको देखनेसे तो यह आशा बहुत नहीं बँधती कि मिलें अवसर पड़नेपर सही काम कर दिखलायेंगी और राष्ट्रके प्रति अपना कर्तव्य समझेंगी। चाहिए तो यह था कि वे खादीपर स्नेह-दृष्टि रखतीं और उसका पोषण करतीं और हुआ यह है कि वे खादी के साथ अनुचित, देश-द्रोहपूर्ण और अवैध प्रतियोगिता करने लगी हैं। पिछले वर्षोंमें हमारी मिलोंने क्रमश: इतनी 'खादी' बनाई : पौण्ड गज १९२५ २,२८,८७,९७० ६,५०,४८,४८७ १९२६ २,७२,३६,३३७ ७,४३,१३,२८० १९२७ ३,३९,७७,८५१ ९,४३,८०,३६८ इतना अधिक मोटा कपड़ा उन्होंने खद्दरके नामपर बेचा है और कुछने तो कांग्रेस संस्थाओं द्वारा तैयार किये गये खादीके अनुकूल वातावरणसे जान बूझकर लाभ उठानेके लिए बेशर्मीसे चरखेकी छाप आदिका भी उपयोग किया है। यह कहते हुए कष्ट होता है कि जिन मिलोंने इस तरहका मोटा कपड़ा बनाकर उसे खद्दरके नामपर बेचा, उन्होंने स्पष्ट देश-द्रोह किया है। अगर उनकी आँखें अब भी खुल जायें और राष्ट्रका उन्होंने जो अहित किया है उसका मुआवजा देनेके लिए ही मिल-मालिक मेरी या दूसरोंकी सुझाई हुई उतनी ही प्रभावपूर्ण शर्तोंपर बहिष्कार आन्दोलनके अगुआ बनें या कमसे कम उसमें शरीक हों तो क्या ही अच्छा हो । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२३४
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