सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२४१

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

२२५. पत्र : सरदारनी एम० एम० सिंहको आश्रम साबरमती ६ अप्रैल, १९२८ प्रिय बहन, आपका पत्र मिला । ऐसे लोगोंको आश्रममें लेनेका आम तौरपर प्रचलन नहीं है, जो किसी भी सदस्यके परिचित न हों। इसलिए मैं चाहूँगा कि यदि आप सचमुच आश्रममें रहना चाहती हैं, तो अपना सारा हवाला देते हुए प्रबन्धक - मण्डलके सचिवको पत्र लिखें । मैं आपको यह भी सूचना दे दूँ कि फिलहाल आश्रम बहुत ज्यादा भरा हुआ है । सरदारनी एम० एम० सिंह अपटन हाउस न्यू कैंट रोड देहरादून अंग्रेजी (एस० एन० १३१६३) की माइक्रोफिल्मसे । २२६. पत्र : एम० दीवान नारायणदासको हृदयसे आपका, आश्रम साबरमती ६ अप्रैल, १९२८ प्रिय मित्र, आपका पत्र मिला । यदि मानवीय सम्बन्ध गणितके नियमोंके अनुसार चलते होते तो जो आप सुझा रहे हैं, ठीक होता । परन्तु जैसे तीस बारका खाना दस बारमें खा लेनेका वही फल नहीं होगा जो तीस बारके खानेको नियमित रूपसे एक-एक दिन करके खाये जानेपर होगा, इसी तरह यदि छः महीनेकी कताई पन्द्रह दिनोंमें की जाये तो उससे काम नहीं चलेगा । भाव यह है कि व्यक्तिकी लगन और अनुशासनकी शक्तियोंका परीक्षण किया जाये । ३६-१४ Gandhi Heritage Portal