सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२४५

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

२३१. पत्र : जी० रामचन्द्रन्को आश्रम प्रिय रामचन्द्रन्, साबरमती ६ अप्रैल, १९२८ अपने पिछले पत्रके सिलसिले में मैं आपको संलग्न पत्र भेज रहा हूँ। अब मैं इस बातके लिए उत्सुक हूँ कि आप सुझावको जितना जल्दी हो सके मान लें । अंग्रेजी (एस० एन० १३५९१ ) की माइक्रोफिल्मसे । २३२. पत्र : चार्ली यू० मॉर्सेलोको हृदयसे आपका, आश्रम साबरमती ६ अप्रैल, १९२८ प्रिय मित्र, आपका पत्र मिला । मैं कोई चमत्कार नहीं करता और न ही चमत्कारोंमें मेरा विश्वास है । मैं आपको सलाह दूंगा कि ईश्वरने आपको जो कुछ दिया है उसीसे यह ध्यान रखते हुए सन्तुष्ट रहें कि बहुतसे लोग ऐसे हैं जो आपसे भी बुरी हालत में हैं। और आखिरकार आँखका अन्धा होना नैतिक दृष्टिसे अन्धा होनेकी अपेक्षा बहुत कम बुरा है। शारीरिक दोषोंपर हमारा वश नहीं है; किन्तु नैतिक दोषोंपर हम काबू पा सकते हैं । इसलिए यदि चमत्कार जैसी कोई चीज हो भी तो उसकी आजमाइश हमें नैतिक कल्याणके लिए करनी चाहिए। चार्ली यू० मॉर्सेलो महोदय पो० ऑ० बॉक्स १२३, वाटरलू न्यूयार्क, सं० रा० अ० अंग्रेजी (एस० एन० १४२८२ ) की फोटो नकलसे । हृदयसे आपका, Gandhi Heritage Portal