२३३. पत्र : ना० र० मलकानीको ७ अप्रैल, १९२८ प्रिय मलकानी, आपका पत्र मिला। मुझे आपका हिसाब-किताब नहीं चाहिए था। मैं आपको अपना बीमा रद कर देनेके लिए बिलकुल नहीं कहता। मेरे मनपर जो बोझ था वह मैंने आपके सामने प्रकट कर दिया है। मेरी पूछता उसे आपको बहुत परेशान नहीं होना चाहिए। हमें ऐसी कोशिश करनी चाहिए कि हम जैसे हैं, वैसे ही दिखते रहें । और यदि हम ऐसा कर सकें तो हमें किन्हीं भी प्रश्नोंकी चिन्ता नहीं होगी । दो सौ रुपये [ प्रति मास ] तो मैं बिना आत्म-सम्मान गँवाये सुलभ कर लूंगा । परन्तु ज्यादासे ज्यादा आशा करनेका यह विशेषाधिकार आपको हमेशा मेरे पास ही रहने देना चाहिए। आपको दहेजकी चिन्ता क्यों करनी चाहिए ? आपको एक पैसा भी नहीं देना है। आपकी लड़कियोंका विवाह आमिल परिवारमें ही हो, ऐसा जरूरी क्यों है ? आप अभीसे लड़कियोंको ऐसा प्रशिक्षण दें कि वे इस बातको भूल जायें कि वे किसी विशेष जातिकी हैं। वे भारतकी हैं और यदि आपको मेरे वर्णाश्रम सम्बन्धी विचारपर विश्वास है तो मामला बहुत आसान हो जाता है । निस्सन्देह आपको वहाँ उसके किराये और खानेके खर्चके अलावा और कुछ भी नहीं देना चाहिए । सस्नेह, अंग्रेजी (जी० एन० ८८५) की फोटो नकलसे । बापू Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२४६
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