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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२४८

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२३६. पत्र : मु० अ० अन्सारीको आश्रम साबरमती प्रिय डा० अन्सारी, ७ अप्रैल, १९२८ आपका पत्र मिला । वाइसरायको जो पत्र आपने लिखा है, मैं उसीसे सन्तोष कर लेता हूँ। मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ कि रियासतें यदि हमारी मदद करें तो हम वह मदद खुशी से स्वीकार करेंगे। परन्तु मैं जानता हूँ कि रियासतों में ऐसी संस्थाको जो साफ तौरपर असहयोगसे जन्मी है या असहयोगके वातावरणमें पनपी हैं, मदद देनेका साहस नहीं होगा । परन्तु यदि वे यह जानकर भी कि यह असहयोगी संस्था है सहायता करते हैं, तो हमें वह सहायता सहर्ष स्वीकार कर लेनी चाहिए। फिलहाल प्रस्तावित यूरोपकी यात्रा मेरे लिये बड़ी परेशानी पैदा कर रही है । मैं कुछ निश्चय नहीं कर पा रहा हूँ। मैं समझता हूँ कि मुझे इस तरह असमंजस में नहीं पड़े रहना चाहिए : परन्तु अपनी कमजोरी छिपानेसे क्या लाभ? मैं स्वयं इसका कारण नहीं बता सकता। बहरहाल ज्यादासे ज्यादा अगले पखवाड़ेके दौरान मुझे कोई निर्णय कर ही लेना चाहिए। स्वास्थ्यमें सुधारकी दृष्टिसे मुझे उसका कोई आकर्षण नहीं है। श्री रोमाँ रोलाँसे मिलने और यूरोपके प्रमुख लोगोंसे शान्तिपूर्ण वार्तालापके लिए ही मैं यूरोप जाऊँगा । देखें ईश्वर क्या रास्ता दिखाता है । बेगम अन्सारी और सोहरा यह चाहती हैं कि मैं उनके नए घरमें रहूँ; इससे क्या लाभ है? मैं वहाँ चाहे जितनी देर रहूँ वे तो अच्छी खासी दूरीपर पर्दे के पीछे छिपी रहती हैं। यदि वे चाहती हैं कि मैं वहाँ आऊँ, तो उन्हें अपने फाजिल कंगन और दूसरे गहने दिखाने होंगे, ताकि मैं उन्हें इन फालतू चीजोंसे छुटकारा दिला सकूँ और उनका अच्छा उपयोग कर सकूँ । जहाँतक जामियाके लिए धन संग्रहका सम्बन्ध है, मुझे आशंका है कि निजी मित्रोंसे चन्दा पा सकनेके अलावा हम और कुछ नहीं कर पायेंगे और ऐसा किया जा सके, इस बातके लिए संविधान और न्यास-पत्रका होना जरूरी है। इसलिए उनको तैयार कराने में जितनी जल्दी की जा सके कीजियेगा । अंग्रेजी (एस० एन० १३१७०) की फोटो - नकलसे । हृदयसे आपका, Gandhi Heritage Portal