सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२५३

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।

 

२४५. पत्र : जे॰ बी॰ कृपलानीको

आश्रम
साबरमती
८ अप्रैल, १९२८

प्रिय प्रोफेसर,

शायद आपको मालूम ही होगा कि कृष्णदास फिलहाल यहाँ नहीं है। बहरहाल उन्होंने मुझे आपका २५ मार्चका पत्र भेज दिया है। आप यह क्यों कहते हैं कि कतैयोंका रजिस्टर रखने का अर्थ होगा हर झोंपड़ीमें जाकर सूत खरीदना? मैंने ऐसी किसी बातका सुझाव दिया ही नहीं है। मैंने तो यह सुझाव दिया है कि जिनसे दलालोंका सम्बन्ध रहता है हमें उन कतैयोंका पता होना चाहिये। न तो हम दलालोंसे अपना वास्ता बिलकुल ही समाप्त कर देना चाहते हैं और न यह चाहते हैं कि हमें उनकी दयापर निर्भर रहना पड़े। कतैयोंको वास्तवमें क्या दिया जाता है, इसके बारेमें भी हमें बेखबर नहीं रहना चाहिए। इसलिए समय–समयपर रजिस्टर भरा जाना चाहिए। एक बार हमें पता चल जाये कि कतैये कौन लोग हैं, वे कहां रहते हैं, उन्हें क्या मिलता है, और वे [कातनेके सिवा और] क्या करते हैं, तो फिर उनके बारेमें छः महीने तक तो चिन्ता करनेकी आवश्यकता नहीं रहती। वास्तवमें तो आपको दलालोंके सम्पर्कमें आने और उनके जरिये कतैयोंसे सम्पर्क करनेमें कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। मैं कह नहीं सकता, अब भी मैं अपनी बात स्पष्ट कर पाया हूँ या नहीं। इनकी कार्यपद्धति न जाननेके कारण इसमें, जिनका मुझे ज्ञान नहीं है ऐसी कुछ कठिनाइयाँ हो सकती हैं। उस हालतमें आप मुझे उन कठिनाइयोंके बारेमें लिखिए ताकि मैं उन्हें दूर करनेके लिए कुछ ठोस सुझाव दे सकूँ।

जहाँ तक पूँजीके अभावका सम्बन्ध है, मैं जमनालालजी और शंकरलालसे सलाह करने जा रहा हूँ। आपने निश्चित रूपसे नहीं बताया है कि आपको कितनी रकम चाहिए। यदि अदायगीका जिम्मा ले लिया जाये तो क्या बाबू शिवप्रसाद गुप्त बिना सूदके उतनी रकम देने को तैयार हैं, और यदि वह तैयार हों तो यह ऋण कितने समयके लिए होगा?

मुझे आपके पत्रका अन्तिम अनुच्छेद अच्छा नहीं लगा। किसी भी स्थितिमें निराशाको तो पास नहीं फटकने देना चाहिए। चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ आपके सामने आयें, आपको आश्रममें जमे रहना है। आपको कोई दूसरा काम नहीं उठाना चाहिए। कृपया नियमित रूपसे लिखते रहियेगा।