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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२५४

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

 

अब क्या आप पुनः पूर्ण रूपसे स्वस्थ हो गये हैं या अब भी कोई परेशानी है? यदि हो तो अब डा॰ अन्सारीको अपेक्षाकृत अधिक अवकाश है।

हृदयसे आपका,

प्रो॰ कृपलानी

गांधी आश्रम

बनारस छावनी

अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१७७) की फोटो–नकलसे।

२४६. पत्र : जवाहरलाल नेहरूको

आश्रम
साबरमती
८ अप्रैल, १९२८

प्रिय जवाहर,

तुम्हारा पत्र मिला। मुझे ऐसा याद नहीं पड़ता कि पिताजीने मुझसे इस महीनेके अन्तिम सप्ताहमें मिल–मालिकोंसे बातचीत करने और फिर बम्बई जानेकी बात कही हो। परन्तु हम दोनोंने विदेशी वस्त्र बहिष्कारके प्रश्नपर विस्तारसे चर्चा की थी और उन्होंने सेठ लालजी, शान्तिकुमार, सेठ अम्बालाल, सेठ कस्तूरभाई और सेठ मंगलदाससे सलाह मशविरा किया था। यह बातचीत तो अच्छी रही परन्तु ठोस काम कुछ नहीं हुआ। अब मैंने सुना है कि मिल–मालिक अपनी स्वदेशी लीग चलाने जा रहे हैं, जिसका अभिप्राय निस्सन्देह यह है कि हममें परस्पर कोई समझौता नहीं हो पा रहा है।

आज मेरी लालाजीसे लम्बी बातचीत हुई, क्योंकि वे दो दिनसे यहाँ हैं। वे विदेशी वस्त्र बहिष्कारके प्रति उत्साहशील हैं। मैंने उन्हें साहित्य दे दिया है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि मैं कुछ नेताओंको आमन्त्रित करूँ और बहिष्कारके सम्बन्धमें उनसे बातचीत करूँ। मैंने उनसे कह दिया कि मुझमें इतना हौसला नहीं है। उनकी राय यह है कि यदि बहिष्कारका तीव्र प्रचार करना हैं, तो मुझे देशसे बाहर हरगिज नहीं जाना चाहिए; मैं इससे निस्सन्देह सहमत हूँ। परन्तु मैं तबतक तीव्र प्रचारका काम अपने हाथमें नहीं ले सकता जबतक कि राजनीतिक दृष्टिसे जागृत भारत पूरे दिलसे इसमें मेरे साथ न हो और जबतक विदेशी कपड़े, मुख्य रूपसे अंग्रेजी कपड़ेके अस्थायी बहिष्कारकी बात छोड़ न दी जाये। इसलिए हमने यह अस्थायी व्यवस्था की है कि जाने माने नेताओं द्वारा की गई सहज कार्रवाईसे यदि कुछ ठोस काम बनता है, तो मुझे यूरोप जानेका विचार छोड़ देना चाहिए। दूसरी ओर वैसा कुछ न होता हो और यदि मुझे अन्यथा अपना रास्ता साफ दिखाई दे तो मैं चला जाऊँगा