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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२५५

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पत्र : शंकरनको


और लालाजी तथा उनके समान विचारोंवाले दूसरे लोग विदेशी वस्त्र बहिष्कारके बारेमें मिलोंकी सहायतासे या उनकी सहायताके बिना तीव्र प्रचारके लिए वातावरण तैयार करें। इसलिए मेरा सुझाव है कि आपको डा॰ अन्सारी और दूसरे लोगोंसे सलाह मशविरा करना चाहिए। मैं समझता हूँ कि वे सब पंजाब जायेंगे, खादी द्वारा विदेशी वस्त्र बहिष्कारके सम्बन्धमें प्रस्ताव पास करेंगे। मैं आपको चेतावनी देता हूँ कि देशी मिलोंमें बने कपड़ेका कोई जिक्र न किया जाये। आप सीधे कह सकते हैं; राष्ट्रकी संगठित शक्तिको तत्काल प्रदर्शित करनेका एकमात्र प्रभावपूर्ण उपाय यही है कि विदेशी वस्त्रका बहिष्कार किया जाये और हाथसे कती और हाथसे बुनी खादी अपनाई जाये, भले ही इसमें पहनावेके बारेमें अपनी रुचि बदलनेकी आवश्यकता पड़े या कुछ आर्थिक त्याग भी क्यों न करना पड़े। आप मित्रोंके साथ जो निजी चर्चा करें वह भी मुझे बतायें और मुझे सलाह दें कि क्या मुझे यूरोप जानेका विचार छोड़ देना चाहिए। यों डा॰ अन्सारीको निर्णय कर सकना चाहिए।

हृदयसे आपका,

अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१७९) की फोटो–नकलसे।

२४७. पत्र : शंकरनको

आश्रम
साबरमती
८ अप्रैल, १९२८

प्रिय शंकरन्,

मैं आज तड़के ही प्रार्थनाके तुरन्त बाद प्यारेलालसे बात करते–करते तुम्हारे बारेमें सोच रहा था; और अभी–अभी तुम्हारा पत्र मिला।

मान लो कि ऐसे अनाथोंकी, जो जहाज टूट जानेसे किसी द्वीपमें आ लगे हों, कोई बस्ती है; वे सब अविवाहित पुरुष हैं; वे यह भी नहीं जानते कि कभी उनके माता–पिता भी थे; यह भी मान लो कि उन्हें अक्षरज्ञान है और पढ़नेसे उन्हें पता चल जाता है कि उन सबके माता–पिता थे; मान लो कि बादमें पढ़ाईके दौरान उन्हें कोई दार्शनिक पुस्तक मिलती है जिसका नाम है 'स्वयं भू', तो क्या वे अनाथ बच्चे दार्शनिक दृष्टिसे यह विश्वास करने लगेंगे कि वे 'स्वयं भू' हैं? जैसे वह काल्पनिक दर्शनकी पुस्तक अधिकांश सीधे–सादे अनाथ बच्चोंके विश्वासको नहीं डिगा पायेगी, उसी तरह तुमने ईश्वरकी अस्तित्वहीनताके सम्बन्धमें जो दार्शनिक पुस्तक पढ़ी है, उससे ईश्वर पर तुम्हारा विश्वास विचलित नहीं होना चाहिए। यदि तुम अपने माता–पिताके अस्तित्वके तथ्यको स्वीकार करते हो तो फिर मूलभूत तथ्य, प्रथम कारणको कैसे अस्वीकार कर सकते हो। इसकी मुझे कोई चिन्ता नहीं कि तुम उस