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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२५६

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२२४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय प्रथम कारण स्वरूप तथ्यका निश्चय हो जानेपर उसे ईश्वर कहते हो या कुछ और। यदि उस प्रथम कारणका निश्चय हो जाये तो फिर इसके बारेमें जाँच-पड़ताल करना बिलकुल व्यर्थ है कि उस प्रथम कारणसे न्याय कैसे मिलता है या अपने चारों ओर हमें जो अन्याय हो रहा प्रतीत होता है वह कैसे होता है। इसके विषयमें असंख्य सिद्धान्त हैं । मेरा कार्य-कारण सिद्धान्त अर्थात् कर्म सिद्धान्तमें विश्वास है। इससे मनुष्यकी सभी शंकाओंका समाधान हो जाता है । परन्तु यदि उससे तुम्हारी शंकाओंका समाधान नहीं होता तो तुम अवश्य ही प्रतीक्षा करो, सजग रहो और प्रार्थना करो । किसी-न-किसी दिन तुम्हें बोध होगा । परन्तु यदि तुम्हारा प्रथम कारणमें विश्वास नहीं हो तो फिर कोई आशा नहीं है। क्योंकि तब तुम प्रार्थना किससे करोगे ? इसलिए ईश्वर पर अपना विश्वास दृढ़ रखो, तर्क पर ध्यान मतदो । क्या तुम अपने माता-पिताके अस्तित्वको सिद्ध कर सकते हो ? क्या तुम यह नहीं कहोगे कि चाहे मैं तर्क दे सकूँ या नहीं, मेरे माता-पिताका अस्तित्व मेरे लिये पूर्ण तथ्य है । यदि तुम पूछताछ करनेवालोंको प्रमाणित करके सन्तुष्ट न कर सको तो तुम कहोगे “ मेरे तर्कमें त्रुटि है, तथ्यमें नहीं ।" ऐसे ही तुम्हें अपने आपसे कहना चाहिए कि चाहे मैं ईश्वर के अस्तित्वको तर्क द्वारा सिद्ध न कर सकूँ, तो भी मैं प्रथम कारणमें मानव- जातिके विश्वास और अनुभवको अवश्य स्वीकार करता हूँ । अब भी यदि तुम्हें सन्तोष न हो तो अवश्य ही मुझसे फिर पूछना । हृदयसे तुम्हारा, अंग्रेजी (एस० एन० १३१७५ और १३१८०) की फोटो नकल से । २४८. पत्र : मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको चि० मणिलाल और सुशीला, [ १० अप्रैल, १९२८ से पूर्व तुम्हारा पत्र मिला। अभी हालमें तो किसी दिन डाक न आई हो, ऐसा नहीं लगता। सुशीलाका अध्ययन ठीक चल रहा है यह तो अच्छा है; किन्तु मुझे तो उसके शरीरकी चिन्ता है। मैं चाहता हूँ कि शरीरको स्वस्थ बनानेके लिए जो भी प्रयत्न कर सकते हो, करो। नीमू अभी यहीं है। रामदास खादीकी फेरीके लिए गया हुआ है । बादमें ज्यादातर तो उसका जमनादासकी पाठशालामें जानेका इरादा है। दोनों वहीं काम करेंगे। देवदास दिल्ली गया है। १. देखिए अगला शीर्षक। Gandhi Heritage Portal