खादीका स्थान २३१ जनताकी कोई हानि नहीं होगी। क्योंकि अगर मिलें जनताके शोषणका काम न करें, जैसा कि वे आज कर रही हैं, बल्कि उनकी सेवा करनेकी दृष्टिसे काम करें तो वे घर-घर चलनेवाले चरखों और करघोंसे होनेवाले उत्पादनको मदद पहुँचायेंगी, उनकी जगह नहीं लेंगी, जैसा कि आज वे कर रही हैं। इसमें कोई शक नहीं कि अगर वे मेरी बतलाई शर्तें स्वीकार करनेमें हिचकें तो इसका कारण यह होगा कि उन शर्तोंके तर्क सिद्ध परिणामसे मिल-मालिक घबराते हैं, उसी तरह जैसे कि अंग्रेजोंको मेरी इस शर्त के तर्क सिद्ध परिणामसे घबराहट होती है कि वे सचमुच में राष्ट्रके सेवक बन कर रहें। इसलिए मैं खादी-प्रेमियोंसे कहूँगा कि आप मेरे इस मेल-जोलके प्रयत्नसे जरा भी मत डरिये । अगर हमारी श्रद्धा अचल हो, अगर खादीमें वह सहज शक्ति हो जिसका हम दावा करते हैं, अगर जनताको सचमुच इसकी जरूरत हो और अगर हम अपने प्रयत्न में लगे ही रहें तो हम अपने उद्देश्यको अवश्य ही प्राप्त कर लेंगे । खादी तभी असफल होगी, जब खादी-प्रेमियोंकी श्रद्धा डगमगा जाये या हमारी श्रद्धाका आधार केवल कोई ऐसी कल्पना हो, जिसमें कोई तथ्य न हो यानी जनता गरीबी से दरअसल पिस न रही हो और उसे सालमें कभी फुरसतका समय न मिलता हो, या फुरसत मिलनेपर भी करोड़ोंके लिए चरखा ही सबसे अधिक उपयुक्त और व्यावहारिक धन्धा न हो । उपर्युक्त बातोंको दृष्टिमें रखकर खादी में मेरा जो अटल विश्वास है, उसकी वजहसे और उस विश्वाससे जन्मे बलके कारण ही मैं मिल मालिकोंसे मेल मिलापकी कोशिश कर रहा हूँ। ऐसा भी हो सकता है, और शायद अब प्रायः निश्चित ही है, कि इस सलाह मशविरेसे तत्काल कोई लाभ होनेवाला न हो। अगर इस बीच हमने विदेशी वस्त्रका बहिष्कार पूरा नहीं कर लिया है तो, आगे कुछ काम करनेमें या रास्ता दिखाने में इससे सहायता मिलेगी । इसलिए एक ही बात दोहरानेकी जोखिम उठाकर भी इस बातपर विचार कर लेना लाभदायक होगा कि बहिष्कारकी योजनामें खादीका क्या स्थान है । मेरे खयालसे विदेशी वस्त्रका बहिष्कार इसीलिए आवश्यक और सम्भव भी है कि जनता पर इसका असर पड़ता है और जनताको इससे लाभ भी पहुँचता है । और यह सफल तभी हो सकता है जब इसमें जनता भी शामिल हो । अगर केवल स्वदेशी मिलोंके ही बलपर विदेशी वस्त्रका बहिष्कार किया जाना सम्भव हो तो, उसका महत्व अस्थायी होगा। मैं निकट भविष्यमें केवल स्वदेशी मिलोंके ही सहारे यह बहिष्कार कर सकना असम्भव मानता हूँ। मेरी सम्मतिमें केवल खादीने ही इस बहिष्कार की बातको व्यावहारिक बनाया है। सचमुच ही, यह इतना अधिक व्यावहारिक है कि अगर राजनीतिक वृत्तिवाले हिन्दुस्तानी खादी बेचनेका भार उठा लें तो एक सालके भीतर ही, देशी या विदेशी मिलोंका बना एक गज कपड़ा न मिले तो भी राष्ट्रकी जरूरत भरकी सारी खादी तैयार की जा सकती है। इस बातपर मैं इस मान्यताके बल पर जोर देता हूँ कि गाँवोंकी जरूरतकी खादी गाँववाले आप बना लेंगे और संगठित केन्द्रोंमें उन्हीं के उपयोगके लिए खादी बनेगी, Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२६३
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