२५९. पत्र : मोतीलाल नेहरूको आश्रम साबरमती प्रिय मोतीलालजी, १२ अप्रैल, १९२८ आपका पत्र मिला । मिल मालिकोंकी ओरसे जो कुछ किया जा रहा था मैंने आपको पत्र उसकी पूरी जानकारीके बगैर नहीं लिखा था । वे अलग संगठन चला रहे हैं; उसका हमसे कोई वास्ता नहीं होगा । बहरहाल, म आपसे पूरी तरह सहमत हूँ कि उनका पूरा सहयोग पानेके लिए हमें कोई कसर उठा नहीं रखनी चाहिए। इधर मैं जो कुछ कर सकता हूँ कर रहा हूँ । सर पुरुषोत्तमदास से बातचीत करनेपर आपको जो सफलता मिले सो आप सूचित करें। लेकिन मैं चाहता हूँ कि आप चरखा आन्दोलनकी सम्भावनाओंका अध्ययन करें। यह इतना निराशाजनक नहीं है जितना कि आप समझते हैं। संक्षेपमें स्थिति इस प्रकार है : उस अवधिके भीतर जिससे राजनीतिज्ञोंको सन्तोष हो, मिलें स्वयं बहिष्कारको सफल नहीं बना सकतीं । परन्तु यदि मिलें चरखेको साथ लेकर काम करें तो बहिष्कारको उस निश्चित अवधि के भीतर इस प्रकार सफल बनाया जा सकता है, जिससे किसी भी देशभक्तकी उत्कट से उत्कट आशाएँ पूरी हो सकें। चरखा अकेला भी उपयुक्त अवधिके भीतर बहिष्कारको सफल बना सकता है; किन्तु उसकी गति राजनीतिज्ञोंके काम करनेकी तीव्रता पर निर्भर करेगी। खादी निर्माताके रूपमें मैं लगभग असीम परिमाणमें खादी देनेके लिए किसीसे भी बातचीत करनेको तैयार हूँ बशर्ते कि वह मुझपर एक किस्मका बन्धन एक सीमासे अधिक नहीं डालता और उसकी कीमतकी चिन्ता नहीं करता । मैं आपको चरखा संघकी रिपोर्टकी एक प्रति और एक छोटी-सी पुस्तिका भेज रहा हूँ जिसे आप पाँच मिनटों में पढ़ सकते हैं, परन्तु उसमें आपको कुछ बड़े प्रभावपूर्ण आंकड़े मिलेंगे। एकमात्र चीज जिससे खादीको प्रगति रुकी हुई है वह है मांगका न होना और पूँजीकी कमी। मैं अब भी रोमां रोलांके अपेक्षित उत्तरकी प्रतीक्षा में हूँ । यदि वे समुद्री तार नहीं भेजते तो फिर शायद अगले हफ्ते उनका पत्र आयेगा । अंग्रेजी (एस० एन० १३१८२) की फोटो नकलसे । १. देखिए “अ० भा० च० संघकी वार्षिक रिपोर्ट ", ५-४-१९२८ । हृदयसे आपका, Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२६६
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