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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२६८

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२३६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय करना चाहते हैं। यों, यह अनुभव-शास्त्र है। इसके विपरीत खगोलशास्त्र अनुभवशास्त्र नहीं है। खादी शास्त्र अनुभव-शास्त्र है, उसमें होनेवाले प्रयोग और उनके परिणाम अनुभव-गम्य हैं, ३३ करोड़ आदमी उसका प्रत्यक्ष अनुभव ले सकते हैं, इसलिए इसकी मर्यादा या सीमा वहाँतक पहुँचती है जहाँतक ईश्वरके नामकी पहुँचती है। इस शास्त्रकी विशालताका पता इससे लग सकता है कि सूत कातने और कपड़ा बुननेवाली मिलोंमें जितनी क्रियाएँ होती हैं वे सभी क्रियाएँ हमें घर बैठे करनी पड़ती हैं। इन मिलोंके चलानेवालोंने इन क्रियाओंके विषयमें अनेक पुस्तकें भी पढ़ी हैं, जिन्हें पढ़ना इन क्रियाओं में निष्णात होनेके लिए आवश्यक है। एक ही क्रिया लीजिए । मिलवालोंको कपासको परीक्षा करनी पड़ती है वैसी ही हमें भी करनी पड़ती है। कपासकी शक्ति, कपास इकट्ठा करनेका शास्त्र जितना उन्हें जानना पड़ता है, उतना ही हमें भी । हमारा पहला ही पाठ कपासके बारेमें है और वह बहुत महत्वपूर्ण है। कुछ काम जो मिलोंको नहीं भी करने पड़ते हैं, हमें करने पड़ते हैं। उदाहरणके लिए, मिलोंको यह सोचनेकी जरा भी नहीं पड़ी है कि कपास ओटते समय बीज अखण्ड रहते हैं, या टूट जाते हैं, मगर इस लापरवाहीसे हमारा काम नहीं चल सकता । हम तो चाहते हैं कि बीजमें पूरा-पूरा सत्व रहे । हम गाय-बैलोंको बिनौले खिलाना चाहते हैं, उनका तेल पेरना चाहते हैं । इन सभी चीजोंके साथ मिलोंको कुछ भी लेना देना नहीं है । हमारे पास चाहे जितने साधन हों, और हमारी चाहे जितनी कोशिश क्यों न हो, किन्तु प्रयोजनके बिना यह सब बेकार है । वह प्रयोजन देशसेवा है। यह वस्तु ऐसी गहरी है कि इसमें जितने गहरे जायें, जा सकते हैं। मिलोंके परिश्रमका पार नहीं होता, क्योंकि उनकी स्वार्थदृष्टि है, उन्हें धन कमाना है, उनके तन्त्र में दण्डनीतिको स्थान है, इनाम-नीतिको भी स्थान है और इनाम नीति अगर दण्डनीति नहीं तो और है ही क्या ? हमारे यहाँ स्वार्थ नहीं है, दण्डनीति भी नहीं है । किन्तु यह उचित नहीं है कि चूंकि स्वार्थ नहीं है, इसलिए हम मिलोंके बराबर श्रम न करें । हमारा काम जितना निःस्वार्थ है, उतने ही अधिक परिश्रमके लायक है। इसमें जितना प्रेम और उद्यम हम डालेंगे उतनी ही जल्दी जीतेंगे। सर जगदीशचन्द्र बोस किसी पौधेका पत्ता लेकर बड़ी सावधानी और सूक्ष्मतासे जाँच करते हैं उसका पृथक्करण करते हैं, देखते हैं कि उसके इन्द्रियाँ हैं या नहीं, मनुष्योंके समान उसे भी 'मात्रास्पर्श' का अनुभव होता है या नहीं। और अपनी परीक्षाका परिणाम संसारके आगे रखते हैं। यह क्या वे द्रव्य के लिए करते हैं ? नहीं। तब क्या कीर्तिके लिए ? नहीं । केवल निःस्वार्थ भावसे करते हैं। किन्तु उनका उद्देश्य ज्ञान है । किन्तु हमारे प्रयोग केवल ज्ञानके लिए ही नहीं हैं। हमारा तो अनुभव-शास्त्र है और हम प्रत्यक्ष परिणाम देखना चाहते हैं । हमें सावधानीसे देखना है कि अमुक कपाससे कितनी रूई निकलती है, उस रूईका कितना सूत होता है, और उस सूतसे कितना कपड़ा बनता है । और इस तरह यह हिसाब जोड़ सकते हैं कि कितने आदमी कितना काम करके सारे देशकी कपड़े की जरूरत पूरी कर सकते हैं। Gandhi Heritage Portal