भाषण: खादी विद्यालयके विद्यार्थियोंके समक्ष २३७ इस शास्त्रको हस्तगत करनेके लिए जितना ज्ञान प्राप्त कर सको, करो, जितने प्रयोग करने हों, कर देखो। इसके लिए तुम्हारे दिलमें उत्साह चाहिए, शौक चाहिए और लगन चाहिए। जो आदमी भक्ति भाव से इस शास्त्रकी साधना करेगा, उसे भगवान् बुद्धि-योग देंगे । किन्तु हमारे लिए शास्त्रका इतना ज्ञान ही लेना काफी नहीं है । अकेला ज्ञान मिलमें चलेगा। हममें तो इस ज्ञानके उपरान्त चारित्र्य चाहिए। तुम आजीविकाके लिए नहीं किन्तु सेवा-भावसे आये हो, खादीमें अपना जीवन देनेकी भावनासे आये हो, और इसके लिए चारित्र्यकी बहुत आवश्यकता रहेगी। चारित्र्यके बिना लोगों में तुम किस भाँति जा सकोगे ? तुम्हारी सेवा कौन स्वीकार करेगा ? कारखाने में काम करनेवाले आदमीके चारित्र्यके बारेमें कोई नहीं सोचता, किन्तु तुम्हारे चारित्र्यके बारेमें सभी पूछेंगे। फिर तुम्हें सेवक बनकर लोगोंमें जाना है, नादिरशाह बनकर नहीं । बन सके तो उनके बीच मजदूर बनकर रहना है। इसके लिए संयमका जीवन चाहिए । और चारित्र्य दिखलानेका पहला चिह्न स्वच्छता होगी। तुम स्वच्छताके नियम सख्ती से पाल कर लोगोंपर जो प्रभाव डाल सकोगे, वह दूसरी तरह नहीं डाल सकोगे । और होना तो ऐसा चाहिए कि नियम पालनेके लिए मत पालो बल्कि नियम पाले बिना तुमसे रहा ही न जाये । तुममें ऐसी वृत्ति उत्पन्न होनी चाहिए कि स्वच्छता तुम्हारा स्वभाव हो जाये, कहीं भी अस्वच्छता देखकर तुमसे रहा ही न जाये । जहाँ भी अस्वच्छता हो, वह हमारी आँख में गड़े और उसे साफ किये बिना हमसे रहा न जाये । हम तो अपने-आपको राष्ट्र-यज्ञ में होम करनेवाले हैं। इस यज्ञमें होम होने के लिए हमें पवित्र और स्वच्छ होना पड़ेगा। क्या गन्दी चीजको जलाने में कुछ फायदा होता है ? किन्तु सुगन्धित वस्तुको जलानेसे वातावरण साफ होता है और सुगन्ध फैलती है। इसलिए हम चन्दन जैसे स्वच्छ बनकर अपनेको इस यज्ञमें होम दें। इस आश्रमकी कल्पना इसी हेतुसे हुई है। राष्ट्र-यज्ञमें आश्रम धूप बने और दूसरी जगह जहाँ भी बदबू हो उसे हम मिटायें। यही हमारा ध्येय है । यह ध्येय अकेला आश्रमका ही नहीं, बल्कि प्रत्येक खादी सेवकका है। और क्या तुम्हें यह भी पता है कि तुम्हारे कार्यका कितना ऊँचा स्थान है ? मुझसे अगर कोई पूछे कि गो-सेवा, चर्मालय इत्यादि प्रवृत्तिके मुकाबले में खादीका क्या स्थान है तो मैं जरूर कहूँगा कि पहला स्थान है। यह तुलसीदासकी भव्य उपमाके अनुसार नीरस दिखाई पड़नेपर भी अधिकसे-अधिक लोकोपकारक है : साधुचरित जिमि सरिस कपासू । निरस बिसद गुनमय फल जासू ।। —- कातना कैसा नीरस लगता है? पंजाबी तो मुझे कहते हैं कि यह स्त्रियोंका काम हमसे नहीं हो सकता । फिर खादी सेवामें मान-सम्मान नहीं मिलता, अधिक वेतन नहीं मिलता । गो-सेवामें दुग्धालयके विशेषज्ञ बनो, चर्म विद्या-विशारद बनो तो अच्छा वेतन मिलेगा । खादी में वेतन पानेके ऐसे प्रलोभन नहीं हैं, क्योंकि यह काम करोड़ोंका है। सारे देशमें खादीका संगठन करनेके लिए सात लाख खादी सेवक चाहिए । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२६९
दिखावट