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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२७७

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२७२. दलितोंकी सेवा दलितोंकी सेवा करनेवाला अपने साथ-साथ समस्त समाजकी सेवा करता है; क्योंकि दूसरेको दवानेवाला खुद दबाया जाता है। दूसरेको गढ़में गिरानेवाला खुद गढ़में गिरता है और गिरे हुएको उठानेवाला खुद भी उठता है । अपने ही भाइयोंकी बड़ी तादादको अस्पृश्य बना कर हम जगतके अस्पृश्य बननेकी स्थिति तक पहुँच गये थे । अब कहा जा सकता है कि इस विपत्ति से बच निकलना शायद सम्भव हो। क्योंकि हिन्दू समाज में इस पापको धोनेके प्रयत्न अनेक दिशाओंमें और अनेक प्रान्तोंमें किये जा रहे हैं । इन प्रयत्नोंमें सबसे बड़ा और सफल प्रयत्न शायद अहमदाबादमें अनसूयाबहनकी मार्फत चल रहा है। गत मास में दो सभाओं में गया। उनमें एक तो मंगी भाइयोंके पंचोंकी और दूसरी मजदूरोंकी शालाओं के बालकोंकी थी। इनमें मुख्यतः दलित जातिके बालक थे। उसका विवरण मुझे पढ़ कर सुनाया गया था । उसमें से नीचे के भाग सबके मनन करने योग्य हैं ।" ऐसी सुव्यवस्थासे, इतने उत्साहसे, इतनी संख्यामें मजदूरोंके लड़के कहीं और पढ़ रहे हों, तो मुझे उसका पता नहीं है । मिल मालिकोंको इस साहसका स्वागत करना चाहिए। यह सुननेमें आया है कि मिल मालिकोंकी ओरसे मिलनेवाली सहायता शायद बन्द की जानेवाली है । मुझे आशा है कि ऐसा नहीं होगा । इष्ट और आवश्यक तो यह है कि वे दिनों-दिन अधिकाधिक सहायता दें। मेरी सम्मतिमें इस साहसपूर्ण कार्यको पूरी मदद देना मिल- मालिकोंका धर्म है । इस प्रयत्न में एक विशेषता यह भी है कि मजदूर इन शालाओंको चलाने में अपना चन्दा यथेष्ट प्रमाणमें देते हैं और अन्तिम उद्देश्य यह है कि ये शालाए मजदूरोंकी ही सहायता से चलें । इस उद्देश्यके पूरा होनेके पहले मजदूरोंकी आर्थिक स्थिति सुधरनी चाहिए। उनमें त्याग-बुद्धि बढ़नी चाहिए, बाल- शिक्षा के प्रति अधिक प्रेम होना चाहिए। इस बीच मिल मालिकों और दूसरे दानी सज्जनोंको इन पाठशालाओंका भार उठाना चाहिए । । मंगियोंकी सभा में उल्लेखनीय अनुभव हुए। भंगी भाइयोंमें शुद्ध उच्चारणसे भजन गानेवाले थे। उनके भजन सुनकर ऐसा नहीं लगता था कि वे किसी दूसरेसे किसी तरह भी कम हैं। उनमें अक्षर-ज्ञान बहुत कम था। वे कर्जदार हैं, कम वेतन पाते हैं और उनमें शराब पीनेवालोंकी संख्या बहुत है । उनमें बहुत ज्यादा लोग जूठा माँगने और खानेवाले भी हैं। उन्हें देख-सुनकर लगता था कि उनमें जितने दोष १. देखिए "भाषण: विद्यार्थियों और अध्यापकों की सभा में ", ३१-३-१९२८ । २. यहां नहीं दिया जा रहा है। ३. देखिए "भाषण : हरिजनोंकी सभामें", २७-३-१९२८ । Gandhi Heritage Portal