सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२७८

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

२४६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय हैं, उनके लिए ऊँचे वर्णके माने जानेवाले हिन्दू जवाबदेह हैं और अपने गुणोंके लिए वे हिन्दू धर्मके मूलमें प्रविष्ट शक्तिके आभारी हैं। हिन्दू-धर्मके संस्कारके कारण ही दलित भंगी वर्ग में भी सभ्यताका उन्मूलन नहीं हो पाया है। अगर हम उन्हें बिल्कुल पशुतुल्य न मानते होते तो उन्हें सड़ा हुआ अनाज और जूठा न देते, उन्हें शराबकी लतसे बचा लेते और निर्दयी महाजनोंके पंजोंसे मुक्त रखते। अब उनका हाथ पकड़ा गया है इसलिए आशा की जा सकती है कि जिसकी सेवाके बलपर हम शहरोंमें रह सकते हैं, समाजके उस उपयोगी अंगकी स्थिति सुधरेगी । दलित जातियोंकी स्थितिमें आन्तरिक सुधारके प्रयत्न अनसूयाबहन जैसे लोग करें, किन्तु उनके लिए घर कौन बनवा देगा ? अहमदाबादके मजदूरोंकी चालें [ भवन ] मैंने देखी हैं। वे जिन कोठरियोंमें रहते हैं, उन्हें घर कहा ही नहीं जा सकता । उनके घर बनवा देनेका काम किसी एक व्यक्तिके बसका नहीं है। वह काम विशेषकर सुधार-

-विभागका है या मिल-मालिकोंका है। मिलके मालिक अपना धर्म न समझें तो

सुधार विभाग तो अपनी जिम्मेदारी नहीं भूल सकता। मजदूरोंके लिए योग्य घर बनाना, जितना जरूरी उनके लिए है उतना ही शहरके आरोग्यके लिए भी है । भंगी बनाम ढेढ़ दलित कौमोंके विषयमें लिखते समय एक तीसरी सभाके' दुःखद अनुभवका भी वर्णन करता हूँ, जहाँ मैं कुछ दिन पहले गया था। कोचरव गाँवमें एक अन्त्यज- शाला है । उसे विद्यापीठके स्नातक चलाते हैं। जान पड़ता है कि उसके लिए वे यथेष्ट परिश्रम करते हैं। उसमें विद्यार्थियोंकी संख्या अच्छी थी। वे सभी ढेढ़ थे शिक्षकोंको भंगीके बालकोंका ध्यान आया और उन्होंने इन बालकोंको पाठशालामें लेने का निश्चय किया। भंगी बालक आये, इसलिए ढेढ़ बालकोंके माँ-बापने अपने लड़कों को पाठशालासे उठा लिया। बादमें उनमेंसे कई लौट आये, मगर बहुतसे बाहर ही रहे। इससे शिक्षकोंने सोचा कि अगर मैं जाऊँ तो शायद ढेढ़ माँ-बाप मान जायेंगे और अपने लड़कोंको वापस भेज देंगे। मैं गया। किन्तु थोड़े ही ढेढ़ माँ-बाप सभामें आये। एक भाई आये। उन्होंने मुझसे डट कर पूछा : 'क्या ढेढ़ भंगीको छूए ? सनातनी ढेढ भाईने समर्थन किया । परम्परासे चलते हुए छुआछूतके धर्मका इस मैंने पूछा, ' पर अगर ढेढ़ भंगीको न छुए तो फिर बनिया, ब्राह्मण वगैरा ढेढ़ को किस तरह छुएँगे ? ' बनिया, ब्राह्मणको हम कहाँ ढेढ़ोंको छूनेको कहते हैं ? वे हमें न छुएँ।' यह कहकर इस ढेढ़भाईने मुझे हरा दिया । हमारे हाथका किया काम यों हमारे हृदयपर चोट करता है। अगर छुआछूत की बीमारी बहुत दिनों चले तो हम एक दूसरेको अछूत बनाते हुए बिना मौत ही मरेंगे। किन्तु अब उसे ढेढ़ माने या ब्राह्मण, बनिया मानें, अस्पृश्यताका साँप अधिक दिनों साँस नहीं ले सकता। १. इस सभाका विवरण उपलब्ध नहीं है। Gandhi Heritage Portal