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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२८२

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२७८. तार : वी॰ एस॰ श्रीनिवास शास्त्रीको[]

अहमदाबाद
१७ अप्रैल, १९२८

परम माननीय शास्त्री
प्रिटोरिया

मेरा विचार है कि १९१४ के समझौतेके प्रमाणपत्र अप्रभावित रहने चाहिए।[]

गांधी

अंग्रेजी (एस॰ एन॰ ११९७४) की फोटो–नकलसे।

  1. यह तार द॰ आ॰ भा॰ तंत्र जोहानिसबर्गेसे आये १३ अप्रैल निम्नतारके उत्तरमें भेजा गया था : नये प्रवास कानूनसे निकलनेवाला परिणाम बहुत गम्भीर है। यदि धारा ५ को पूरी तरह लागू कर दिया गया तो जिनके दावे आरम्भते ही हैं, ऐसे पंजीकरण प्रमाणपत्र रखनेवालोंके संघर्षसे प्राप्त किये गये अधिकार भी नष्ट हो जायेंगे। यदि कोई ऐसी त्रुटि निकल आये, जिससे लगता हो कि प्रवेश अवैध है तो छूट इस शर्त पर दी जाती है कि लोगोंके पास फिलहाल जो प्रमाणपत्र हैं उन्हें वे सरकारके हवाले कर दें और सरकार इसके बदलेमें उन्हें ऐसे पत्र देगी जिनसे उन्हें अस्थायी परमिट रखनेवालोंका अधिकार प्राप्त हो जायेगा। किन्तु पत्नियों और बच्चोंको वह अधिकार नहीं मिलेगा। छूटके लिए पहली नवम्बरसे पूर्वं प्रार्थनापत्र अवश्य दे दिया जाना चाहिए। उसके बाद तहकीकात और निर्वासन आदिका सिलसिला जारी हो जायेगा जिसके परिणाम स्वरूप समाजका हतोत्साह हो जाना अनिवार्य हो जायेगा। हमने आग्रह किया है कि नये प्रवास कानूनको व्याप्तिका क्षेत्र सीमित करनेके लिए और गांधी–स्मट्स समझौतेकी भावनाको थोड़ा–बहुत बनाये रखनेके लिए १९१४ तकके प्रवासियोंको उसके प्रभावसे मुक्त माना जाये। प्रार्थना है कि आप कमसे–कम इतनी रियायत प्राप्त करनेके लिए जोर डालनेके लिए शास्त्रीको समुद्री तार भेजिए। तत्काल उत्तर दीजिए (एस॰ एन॰ ११९७४)।
  2. उत्तरमें शास्त्रीने १८ अप्रैलको समुद्री तार भेजा जिसमें लिखा था : आपका तार मिला। मन्त्रीने १९१४ से पहले प्रमाणपत्र–प्राप्त व्यक्तियोंके सम्बन्धर्मे विशेष व्यवहारका आश्वासन दिये बिना पहले ही पिछली रात छूटकी शर्तें घोषित कर दीं (एस॰ एन॰ ११९७४)।