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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३३

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१. भाषण : गुजरात विद्यापीठके विद्यार्थियोंके समक्ष' । [१ फरवरी, १९२८ ] मैं आज यहाँ जो आप लोगोंके बीच में आया हूँ उस सम्बन्धमें एक अभयदान यह देता हूँ कि मैं यहाँ सीजरकी तरह " मैं आया, मैंने देखा और मैंने जीत लिया " जैसा कुछ करनेके लिए नहीं आया हूँ। 'आप यह करें, वह न करें' ऐसा कहकर मैं आप लोगोंका जीवन अव्यवस्थित भी नहीं करना चाहता। मैं तो केवल आपके बीच आया हूँ और आपकी जितनी हो सके उतनी सेवा करना चाहता हूँ । आपके नित्यके कार्यक्रममें अथवा अध्यापकोंके अध्ययन कार्यमें खलल डालनेकी मेरी इच्छा ही नहीं है। मैं यहाँ उपस्थित हूँ, इसलिए यदि कोई विद्यार्थी मेरे पास आना चाहे तो आ सकता है । मुझसे कुछ पूछना चाहे तो पूछ सकता है । मैं यह जानता हूँ कि आजतक विद्यापीठके कुलपतिके नाते मुझे इसकी जितनी सेवा करनी थी उतनी मैं नहीं कर पाया हूँ । किन्तु इसका यह कारण नहीं था कि ऐसा करनेकी मेरी इच्छा नहीं थी । किन्तु यह मेरा दुर्भाग्य है कि मैं जितनी सेवा करना चाहता हूँ उतनी कर नहीं पाता। मेरे मनमें हमेशा विद्यापीठका ध्यान रहता है और मैं यह ईश्वरकी बहुत बड़ी कृपा मानता हूँ कि इस समय मुझे उसकी सेवाका अवसर मिला है । आज तो मैं अपने ऊपर चढ़े हुए कर्जका ब्याज मात्र देने आया हूँ। और वह भी कुलपति न रहनेके बाद । अब यह ब्याज स्वीकार करना न करना आप पर निर्भर है। आप इस प्रार्थनामें उपस्थित हुए इससे मुझे प्रसन्नता हुई । यदि आप प्रार्थनाका रहस्य समझकर आयेंगे तो मुझे प्रसन्नता ही होगी। पर इसके लिए मैं आग्रह नहीं करता । आप न आते तो मुझे दुख होता, किन्तु मैं आपके आगे इसका दुखड़ा नहीं रोऊँगा । फिर भी यह तो अवश्य चाहता हूँ कि आप लोग साँझकी प्रार्थनाके समय आश्रममें आयें । मेरी यह भी इच्छा है कि इस तरह आश्रमके साथ आपका सम्बन्ध और भी दृढ़ हो । यह बात मुझे बहुत अच्छी लगती है। इसका कारण मुझे आपपर जाहिर कर देना चाहिए। मैं आश्रमको अपना सर्वस्व मानता हूँ। मैं तो चाहता हूँ कि जगत मेरी इसी कृतिसे मेरा मूल्यांकन करे, मेरे दूसरे कार्योंसे नहीं। अपने लिये तो मैंने यही माप रखा है । आश्रमकी अपूर्णताका मुझे पूरी तरह भान है। मैं इसकी अनेक त्रुटियाँ गिना सकता हूँ, जिनका आपको खयाल भी नहीं होगा और जिनको आप जानते होंगे ऐसी सब त्रुटियोंको इकट्ठा करें तो वे बहुत ज्यादा हो जायेंगी । फिर भी मैं यह कहना चाहता हूँ कि इन त्रुटियोंको एक तरफ रखें और दूसरी तरफ १. महादेव देसाईकी “साप्ताहिक चिट्ठीसे" उद्धृत । । २. साधन-सूत्र के अनुसार गांधीजी ३१ जनवरीकी शामको विद्यापीठ पहुँचे थे और यह भाषण उन्होंने दूसरे दिन सुबह प्रार्थना सभा में दिया था । ३६-१ Gandhi Heritage Portal