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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३४

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२ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय आश्रमके गुण रखकर उनकी तुलना करें तो जमाका पलड़ा भारी होगा, इसमें मुझे कोई शंका नहीं है। इसलिए आश्रमके साथ आपके सम्बन्धका और भी गहरा होना मुझे प्रिय लगता है । " मैं आपके बीच बोझ बनकर नहीं मित्र बनकर रहना चाहता हूँ और अगर आप चाहेंगे तो मार्गदर्शककी तरह भी । अगर आप चाहें तो मैं रोज १५ मिनट या हफ्ते में आपके दो वर्ग पढ़ा सकूंगा । मैं आपको क्या पढ़ाऊँगा सो तो निश्चित नहीं है; किन्तु वह मैं आप पर छोड़ता हूँ । [ गुजरातीसे ] नवजीवन ५-२-१९२८ २. पत्र : ना० र० मलकानीको सत्याग्रह आश्रम साबरमती १ फरवरी, १९२८ प्रिय मलकानी, तुम्हारा पत्र मिला । तुम अपनी झिझक छोड़ सकते तो अच्छा होता । ठक्कर बापाको बार-बार कहते रहो। सर पु०र पर मेरे पत्रकी अपेक्षा उनके पत्रसे ज्यादा असर होगा; क्योंकि उनके पत्रके पीछे अनुभवका बल भी रहेगा। लेकिन मुझे स्थितिकी जानकारी देते रहना और जब कभी कुछ ऐसा हो कि मैं 'यंग इंडिया' के जरिये कुछ मदद कर सकूं, तो मुझे बताना। लेकिन तब तुम मुझे अपने किये कामका संक्षिप्त हवाला लिख भेजना और यह भी लिखना कि और क्या कुछ किये जा सकनेकी आशा है । तुम्हें मुझे यह बताना होगा कि क्या तुम अवकाश होने पर अखिल भारतीय अस्पृश्यता सम्बन्धी काम हाथमें लेनेके लिए तैयार हो। तुम उसका परिणाम तो जानते ही हो । सम्भव है तुम्हें लगातार दौरे पर ही रहना पड़े। मैं चाहता हूँ कि तुम खूब सोच-विचारकर और निश्चयके साथ काम करो । सस्नेह, अंग्रेजी (जी० एन० ८८१ ) की फोटो नकलसे । १. यहाँ से आगे दो अनुच्छेद यंग इंडिया २-२-१९२८ से लिये गये हैं। २. पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास । बापू Gandhi Heritage Portal