लोग अपनी मरजीका खाना खिलायें, वह दूसरी बात है। एकमें संस्थाको चलानेकी मंशा है, दूसरीमें अनाथोंका अपमान होता है। फिर, इस तरह भोजन मंजूर करनेवाली संस्था उसमें रहनेवालोंकी तन्दुरुस्तीको जोखिममें डालती है और उन्हें चटोरे बनाकर उनकी जिन्दगी बिगाड़ती है। इसलिए अगर इस तरहकी संस्थाएँ भोजनके बजाय दान ही लेनेका आग्रह रखें और दानी लोग भोजनके रूपमें दान न देनेका आग्रह रखें, तो वे प्रजाकी भलाईके भागीदार बनेंगे।
- [गुजराती से]
- नवजीवन, १३-५-१९२८
३७७. बारडोलीका यज्ञ
बारडोलीमें जो यज्ञ चल रहा है, उसके सम्बन्धमें वल्लभभाईने अब तक कोई आर्थिक मदद नहीं माँगी थी। किन्तु अब माँगनेका अवसर आ गया है। श्री रविशंकर और श्री चिनाई जैसे सत्याग्रहके सिपाही कैदमें जा बैठे हैं। दूसरे भी जायेंगे। जाना ही होगा। लोगोंमें अगर जीवट होगा और सरकार अपना हठ अन्त तक न छोड़ेगी तो एक भी सेवक कैदके बाहर न रहेगा और प्रजाका एक भी व्यक्ति माल–मिल्कियतवाला या कैदके बाहर न बच रहेगा। सभी लड़ाइयाँ अमुक हदतक एक सरीखी ही होती हैं, फिर वे चाहे पशुबलकी हों या आत्मबलकी। दोनोंमें कष्ट तो सहना ही होता है। यूरोप के महायुद्धमें दोनों पक्षोंके लोगों की दुर्दशा हुई। दोनों पक्षोंके सिपाहियोंने अपनी जान गँवाई। जर्मनीके असंख्य आदमी बेघरबार हो गये। किन्तु सत्याग्रह और पशुबलका साम्य यहीं खत्म हो जाता है। सत्याग्रही आप ही नष्ट होता है। वह विरोधीका सर्वनाश करनेके क्षणिक आनन्दका जानबूझकर त्याग करता है और अपने त्यागमें ही रस लूटता है। इसलिए सत्याग्रहको लड़ाईको यज्ञ कहेंगे। उसमें आत्मशुद्धि है।
इस यज्ञमें आज तक आर्थिक मदद मुख्यतः बारडोलीसे ही मिलती रही है। बाहरसे जिन्होंने स्वेच्छासे कोई मदद भेजी है, वह स्वीकार की गई है। अब ऐसा करना शक्तिसे बाहर कहा जायेगा। बारडोलीके लोगोंके पास कल न घर, न वार, न खेत होगा और न ढोर ही होंगे। ऐसी स्थितिमें बाहरकी मदद माँगनेका अधिकार वल्लभभाईको है। वल्लभभाईकी भिक्षाकी पुकार सभी कोई सुनें और जिन्हें बारडोलीकी लड़ाई पसन्द है, जो उसमें शुद्धि और वीरता देखते हैं, वे यथाशक्ति अपना भाग चुकायें।
- [गुजरातीसे]
- नवजीवन, १३-५-१९२८