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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३७१

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। सवाल तो यह है ३३९ गिरोह" कहते हैं, वे राष्ट्रके सम्माननीय सेवक हैं जो काफी त्याग करके बारडोलीकी सेवा मुफ्त में कर रहे हैं। इन लोगोंमें वल्लभभाईके अलावा, जो खुद बैरिस्टर हैं, वयोवृद्ध अब्बास तैयबजी हैं, वे भी एक बैरिस्टर हैं और बड़ौदा रियासतके प्रधान न्यायाधीश रह चुके हैं, इमाम साहब बावजीर हैं, जो तकरीबन एक फकीर ही हैं, और जिन्हें अपनी रोटियोंके लिए बारडोलीसे कुछ लेनेकी जरूरत नहीं है, और हैं डाक्टर सुमन्त मेहता और उन्हींके समान उनकी सुसंस्कृत पत्नी । डाक्टर सुमन्त मेहता जो पिछले काफी अर्से से बीमार रहते हैं, अपने स्वास्थ्यको खतरेमें डालकर बारडोली गये हैं । इन चारोंमें से खेड़ाका कोई नहीं है । फिर हैं ठासाके दरबार साहब चन्दूलाल और उनकी बहादुर पत्नी भक्ति बा, जिन्होंने देशके लिए अपनी रियासतका बलिदान किया है । ये लोग बारेडालीके लोगोंपर नहीं जीते । इनके अलावा और लोगोंमें डाक्टर चन्दूलाल और त्रिभुवनदास हैं; वे भी खेड़ाके नहीं हैं । फिर फूलचन्द शाह उनकी पत्नी तथा उनके योग्य सहायक शिवानंद (जो जेल भेजे जा चुके हैं) के नाम जोड़ दीजिए। इनमें भी खेड़ाका कोई नहीं है और ये कई वर्षोंसे शान्तिपूर्ण सेवामें लगे हुए हैं। यह तो बारडोलीकी करुण पुकार है, जो इन लोगोंको तथा दूसरोंको, जिनके नाम में गिना सकता हूँ, वहाँ खींच लाई है । अगर आयुक्तको अपनी इज्जतका जरा भी खयाल तो वह इन महिलाओं और भद्र पुरुषोंसे अपने आप क्षमा माँगेंगे। इतने अधिक कार्य- कर्त्ताओंके बीच, सच पूछो तो खेड़ाके कार्यकर्त्ता दालमें नमकके बराबर भी नहीं हैं । आयुक्तने बड़ी शानसे बम्बई कौन्सिलके विरुद्ध मतको प्रकाशित किया है, और बड़ी सफाईसे स्वार्थवश कौंसिलके पहले दो प्रस्तावोंका जिक्र किया है। वे प्रस्ताव सरकारके विरुद्ध थे और सरकारने उन्हें इतना हेय माना था कि उनपर विचार करनेकी भी, या उनका जिक्र करनेकी भी जरूरत नहीं समझी थी । आयुक्तने कामकी इस महत्वपूर्ण बातको छिपाया है, दबाया है कि सत्याग्रह शुरू करनके पहले, बारडोली के किसानोंने वे सभी उपाय काममें लाकर देख लिये थे, जिन्हें वैध कहते हैं; किन्तु उनसे उनकी शिकायत दूर न हुई बल्कि वे बिल्कुल असफल रहे । आयुक्तका यह कहना लोगोंकी आँखोंमें धूल झोंकना है कि अगर दुखद अनुभवोंके बाद बारडोलीके लोग सत्याग्रह बन्द कर दें तो वे उन गांवोंके मामलेकी जांच बखुशी करेंगे, जिनके वर्गीकरणमें भूल मालूम पड़ेगी। वह इस सत्यको छिपाते हैं कि विचारणीय प्रश्न यह नहीं है कि इस गाँव या उस गाँवके वर्गीकरणमें मूल है या नहीं, बल्कि बात तो यह है कि लगान निश्चित करनेका सारा तरीका ही स्पष्टत: गलत है। और बारडोलीवाले इस बातपर अड़े हुए नहीं हैं कि उनका ही दावा सही है, बल्कि वे एक स्वतन्त्र और निष्पक्ष न्यायाधिकरणकी मांग करते हैं, जो उनकी शिकायतकी न्याययताकी जाँच करे । न्यायाधिकरणका जो कुछ भी फैसला होगा वे उसे माननेको तैयार हैं । यहाँ लगान देनेसे जी चुरानेका सवाल ही नहीं है, व्यक्तिगत शिकायतें दूर करनेका सवाल ही नहीं है । सवाल तो यहाँ सिद्धान्तका है । बारडोलीवाले तो सरकारके इस हकको माननेसे इनकार करते हैं कि वह जब Gandhi Heritage Portal